बुधवार, 9 मार्च 2016

कन्हैया कुमार, फिर भी यह एक लंबी राजनीतिक लड़ाई है. It is long term struggle, Kanhaiya Kumar.

कन्हैया कुमार ने अपनी रिहाई के बाद जेएनयू में जो भाषण दिया, वह बहुचर्चित हो चुका है। उसके बाद अलग-अलग टीवी चैनलों को उन्होंने कई इंटरव्यू दिए। मीडिया की चर्चाओं में स्वाभाविक रूप से उनके वक्तव्यों के उन हिस्सों की ज्यादा चर्चा हुई, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक पर निशाना साधा। यह हमला इतना तीखा था कि उससे भारतीय जनता पार्टी विचलित हुई। इसकी मिसाल उसके नेताओं के बयान हैँ। संघ खेमे की की प्रतिक्रिया तो उसके अपेक्षा के अनुरूप ही हिंसक बयानबाजी रही।
 
लेकिन इनसे अलग कन्हैया कुमार ने कुछ ऐसा भी कहा, जिसका संदर्भ दूरगामी है। उन्होंने कहा कि इस वक्त संघर्ष की रेखाएं साफ खिंची हुई हैँ। इसमें एक तरफ आरएसएस और उसकी सोच से सहमत ताकतें हैं और दूसरी तरफ प्रगतिशील शक्तियां। कहा जा सकता है कि मौजूदा समय में भारत के मुख्य सामाजिक अंतर्विरोध के बारे में किसी और नेता ने ऐसी साफ समझ बेहिचक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं रखी है। इसीलिए कन्हैया ने एक स्वर में सीताराम येचुरी से लेकर राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और उन तमाम लोगों का आभार जताया जो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा राजद्रोह के मामले में उनके समर्थन में सामने आए। इस सिलसिले में कन्हैया कुमार ने यह महत्त्वपूर्ण बात बार-बार कही कि इस लड़ाई में कई दायरे टूटे हैँ। इस पर उन्होंने संतोष जताया। इसे भविष्य की उम्मीद बताया।
यह दायरा टूटने की ही झलक थी कि जेएनयू के मुद्दे पर दिल्ली में निकले बहुचर्चित जुलूस में एनएसयूआई, एसएफआई, एआईएसएफ, आइसा तथा दूसरे छात्र संगठन एक साथ शामिल हुए। किसी पार्टी या संगठन से ना जुड़े हजारों नौजवानों एवं बुद्धिजीवियों-कलाकारों की वहां उपस्थिति राष्ट्रवाद की भगवा समझ थोपने की एनडीए सरकार की कोशिशों से फैलती उद्विग्नता और आक्रोश का प्रमाण थी। इस सिलसिले में एक घटना खास उल्लेखनीय है। 
 
30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन राहुल गांधी हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ छात्रों के विरोध कार्यक्रम में शामिल हुए। शाम को उन्होंने वहां मौजूद नौजवानों को संबोधित किया। उपस्थित श्रोताओं में अंबेडकरवादी व्यक्तियों की बहुसंख्या थी। मगर वहां राहुल गांधी ने अपना भाषण गांधीजी को श्रद्धांजलि देते हुए शुरू किया। गुजरे दशकों में गांधी के प्रति अंबेडकरवादी समूहों का कड़ा आलोचनात्मक रुख जग-जाहिर रहा है। लेकिन वहां राहुल गांधी के भाषण के बीच कोई टोका-टाकी नहीं हुई। अबेंडकरवादी श्रोता समूह ने धीरज और सहिष्णुता के साथ गांधी की तारीफ में कहे गए शब्द सुने।
 
कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी जेएनयू पहुंचे तो वहां श्रोता समूह में बहुसंख्या वाम रुझान वाले छात्रों-शिक्षकों की थी। राहुल गांधी सीताराम येचुरी और डी राजा जैसे नेताओं के साथ बैठे। फिर भाषण दिया। एक बार फिर सबका ध्यान मुद्दे पर रहा। आपसी राजनीतिक मतभेद वहां गौण हो गए।
 
kanhaiyaकन्हैया कुमार ने अपनी रिहाई के बाद जब मीडिया को दिए इंटरव्यू में मार्क्स, अंबेडकर, पेरियार, फुले, गांधी, नेहरू के नाम एक क्रम में लिए, तो जाहिर है उनके ध्यान में देश में होता वही ध्रुवीकरण रहा होगा, जो इस वक्त का तकाजा है। आधुनिक भारत का विचार इन तमाम और अन्य कई (मसलन, बिरसा मुंडा) विरासतों का साझा परिणाम है। भारत के इस विचार के जन्म और आगे बढ़ने का इतिहास 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से शुरू होता है। इस विचार के सार-तत्व को एक वाक्य में कहना हो तो वो यह होगा कि भारतीय भूमि पर जन्मा हर व्यक्ति भारतीय है और उसका दर्जा समान है। सबके आर्थिक हित समान हैं, विचारों का खुलापन, एक-दूसरे की जीवन-शैली के प्रति सहिष्णुता, लोकतंत्र, सामाजिक-आर्थिक न्याय और प्रगति का एजेंडा भारतीय राष्ट्रवाद की इस विचारधारा के आधार हैँ।
 
धर्म आधारित राष्ट्रवाद के विचार से उपरोक्त भारतीय राष्ट्रवाद का संघर्ष स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों से जारी है। 2014 के आम चुनाव में उभरे जनादेश से हिंदू राष्ट्रवाद का विचार देश की केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो गया। इससे न्याय एवं स्वतंत्रता की दिशा में हुई वह तमाम प्रगति खतरे में पड़ गई है, जो भारतीय जनता ने अपने लंबे संघर्ष से हासिल की। इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें तो कन्हैया कुमार की बातों का महत्त्व स्वयंसिद्ध हो जाता है।
 
यह संकट का समय है, लेकिन उम्मीद की किरण यह है कि भारतीय जन के एक बड़े हिस्से ने समय रहते इसकी पहचान कर ली है। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के बरक्स न्याय और प्रगति की विचारधाराओं से प्रेरित राष्ट्रवाद की शक्तियां जाग्रत हो रही हैँ। कन्हैया कुमार से जुड़े घटनाक्रम ने इस विश्वास को मजबूती दी है। कन्हैया के भाषणों को मिली लोकप्रियता मिसाल है कि आधुनिक भारत के सपने को नया जन-समर्थन मिल रहा है
 
रोहित वेमुला और कन्हैया कुमार के मामलों से सामाजिक विषमता एवं विभाजनों पर परदा डालकर अन्याय और गैर-बराबरी की व्यवस्था को कायम रखने के प्रयोजन बेनकाब हुए हैँ। जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के तीन नेताओं का अपने संगठन से इस्तीफा इसकी ही मिसाल था। वे तीनों मनुस्मृति जलाना चाहते थे, लेकिन उनके संगठन ने उसकी इजाजत नही दी। यह घटना बताती है कि हिंदुत्व के नाम पर जातीय (प्रकारांतर में आर्थिक) शोषण को मजबूत रखने की कोशिशों का सफल होना आज कठिन है। बाबा साहेब अंबेडकर के सपनों और उद्देश्य को नाकाम करने के लिए उनकी जय बोलने का पाखंड ज्यादा देर तक नहीं चल सकता।   
 
फिर भी यह एक लंबी राजनीतिक लड़ाई है। बेशक इसका तात्कालिक परिणाम आने वाले सभी चुनाव नतीजों से तय होगा। मगर इसके साथ उस आधार पर प्रहार करना भी जरूरी है जिस वजह से पुराने आधिपत्य को कायम रखने पर आमादा ताकतें आधुनिक समय में भी अपनी चुनाव प्रणाली के अंदर राजनीतिक बहुमत बना लेने में सफल हो जाती हैँ। यह आधार वर्ग-विभाजन, जातिवाद और अज्ञानता के कारण कायम है। इस बुनियाद तो तोड़ना तभी संभव है जब वर्तमान बहस को विकल्पों पर विचार की तरफ ले जाया जाए। कन्हैया कुमार ने इसमें योगदान किया है। रोहित वेमुला और जेएनयू प्रकरणों से इस दिशा में आगे बढ़ने की संभावना बनी है।
 
डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं///SRNBT

मंगलवार, 8 मार्च 2016

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी बोलने का अधिकार है? JNU Kanhaiya Kumar Bail Matter.


कन्हैया को दिल्ली हाई कोर्ट ने जब से ज़मानत दी है, तभी से मैं पसोपेश में हूं। अंतरिम ज़मानत क्यों दी, पूरी ज़मानत क्यों नहीं दी? क्या अंतरिम ज़मानत का यह मतलब है कि कोर्ट उन्हें आधा दोषी और आधा निर्दोष मानता है? क्या कोर्ट को लगता है कि कन्हैया ने राजद्रोही हैं? यदि हां, तो उसने उनको ज़मानत पर क्यों छोड़ा?
मामले को समझने के लिए मैंने कोर्ट का पूरा फ़ैसला पढ़ा।  पहली से आख़िरी लाइन तक। पढ़ने के बाद मैंने पाया कि कन्हैया को अंतरिम ज़मानत देने के पीछे न्यायाधीश प्रतिभा रानी के जो तर्क हैं, उनको इन 9 पॉइंट्स में समेटा जा सकता है।

1. इस बात पर कोई शंका नहीं कि जेएनयू में देशविरोधी नारे लगे थे।
2. लेकिन कन्हैया ने वैसे नारे लगाए थे, ऐसा कोई विडियो सबूत नहीं है हालांकि पुलिस का कहना है कि कुछ गवाहों ने ऐसा कहा है कि कन्हैया ने भी वहां राष्ट्रविरोधी नारे लगाए थे।
3. लेकिन यह भी साफ़ है कि कन्हैया वहां मौजूद थे।
4. जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष होने के नाते कन्हैया का यह फ़र्ज़ था कि वह कैंपस में कोई भी देशविरोधी कार्यक्रम नहीं होने देते लेकिन उन्होंने अपनी यह भूमिका नहीं निभाई।
5. राज्य ने जिस सामग्री के आधार पर कन्हैया के विरुद्ध (राजद्रोह के) गंभीर आरोप लगाए हैं, उसके (सामग्री के) राष्ट्रविरोधी चरित्र को देखते हुए यह उचित लगता है कि कन्हैया को जेल में ही रखा जाए।
6. लेकिन जांच अभी शुरुआती स्टेज में है और यह कहना अभी संभव नहीं है कि कन्हैया का अपराध आख़िरकार कितना बड़ा या छोटा साबित होगा। जिस आरोप में उनको गिरफ्तार किया गया है, उसके लिए अधिकतम उम्रकैद से लेकर निम्नतम ज़ुर्माने की सज़ा हो सकती है।
7. जेएनयू में जो देशविरोधी नारे लगे, उन नारों के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी को कवच के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जेएनयू के छात्रों की ऐसी सोच एक इन्फ़ेक्शन की तरह है जिसका इलाज करना ज़रूरी है। यदि ऐंटीबायोटिक गोलियों से यह ठीक हो जाए तो बेहतर वरना सर्जरी तक भी करनी पड़ सकती है।
8. कन्हैया ने हिरासत में रहने के दौरान हाल के घटनाचक्र पर चिंतन-मनन किया होगा। वह मुख्यधारा में रहें, इस इरादे से मैं फ़िलहाल उनका पारंपरिक तरीक़े से इलाज करना चाहूंगी।
9. सभी तथ्यों और स्थितियों को देखते हुए मैं उनको 6 महीनों की अंतरिम ज़मानत पर रिहा करने का आदेश देती हूं।
जज महोदया ने फ़ैसले में कई और बातें भी कही हैं जिनमें से कुछ मुझे समझ में आईं और कुछ नहीं आईं। जो समझ में नहीं आई, वह एक बात उनका यह कहना है कि जो देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का आनंद ले रहे हैं, उन्हें इसके लिए भारतीय सेना का शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्योंकि उसके बिना यह आज़ादी संभव नहीं थी। मेरी समझ से भारतीय सेना का काम देश की सीमाओँ की रक्षा करना है जो वह बहुत अच्छी तरह से कर रही है लेकिन बोलने की आज़ादी में उसका क्या रोल है, यह मेरे पल्ले नहीं पड़ा।

आइए, देखें, जज साहिबा ने फ़ैसले में क्या लिखा है।
Army 1उन्होंने लिखा है, ‘भारतीय संविधान के तहत इस देश के नागरिकों को जो बोलने की आज़ादी मिली हुई है, वह हर नागरिक को यथेष्ट अधिकार देती है कि वह संवैधानिक दायरे में रहते हुए अपनी (मनपसंद) विचारधारा को अपनाए या राजनीतिक मंच से जुड़े। … लेकिन सभी पक्षों को यह समझना चाहिए कि वे यह आज़ादी केवल इस कारण भोग पा रहे हैं कि देश की सशस्त्र सेनाएं और अर्धसैनिक बल हमारी सीमाओं की सुरक्षा कर रहे हैं।’
यह मेरे लिए नई बात है। मेरी जानकारी के अनुसार बोलने की आज़ादी हमें हमारे संविधान ने दी है जिसे संविधान सभा ने बनाया। मौजूदा या भावी सरकार संसद की सहमति से चाहे तो किसी ख़ास परिस्थिति में उसमें कमी-बेशी कर सकती है, यह भी ठीक है। लेकिन सेना का इसमें भला क्या रोल है? यदि बोलने की आज़ादी में सेना का रोल होता तो पाकिस्तान या बांग्लादेश में सैन्य शासन के रहते वहां बोलने की पूरी स्वतंत्रता होती। यदि सेनाओं के कारण ही किसी देश के नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता मिलती तो चीनी सेना ने थ्येन अान मन चौक में जमा हुए सैकड़ों युवाओं पर टैंक न चढ़ा दिए होते। यदि सेना के कारण ही हमारी बोलने की आज़ादी बची हुई है तो आपातकाल (1975-77) में भी हम बोल पाते क्योंकि तब भी भारतीय सीमाओं की रक्षा हमारी सेनाएं ही कर रही थीं।
हाई कोर्ट के आदेश पर कार्टूनिस्ट आर. प्रसाद की व्यंग्यरेखाएं। (ईकनॉमिक टाइम्स से साभार)
हाई कोर्ट के आदेश पर कार्टूनिस्ट आर. प्रसाद की व्यंग्यरेखाएं। (ईकनॉमिक टाइम्स से साभार)

सेनाएं देश की रक्षा करती हैं, यह सच है मगर वे जनता की इच्छा से या जनता के लिए ऐसा नहीं करतीं। वे संवैधानिक व्यवस्था के तहत चुने गए केंद्रीय शासन के निर्देश या आदेश पर ऐसा करती हैं। पहले राजतंत्र था तो सेनाएं राजा के आदेशानुसार चलती थी, आज लोकतंत्र है तो लोकतांत्रिक शासकों के कहे अनुसार चलती हैं। कभी-कभी कोई सेनाध्यक्ष या सैन्य अधिकारियों का समूह ज़्यादा महत्वाकांक्षी हो जाए तो ख़ुद शासक बन जाता है। लेकिन शासन व्यवस्था चाहे जैसी भी हो, लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक, सेना का काम कभी नहीं रहा कि वह देखे कि जनता को बोलने की आज़ादी मिली हुई है या नहीं। जिस सेना में ख़ुद बोलने की आज़ादी नहीं होती, वह जनता की बोलने की आज़ादी की रक्षा कैसे करेगी और क्यों करेगी? यह उसके काम का हिस्सा है भी नहीं।

यदि जज महोदया के कहने के मतलब यह है कि सेना देश की सीमाओं की रक्षा नहीं करती तो दुश्मन की सेनाएं दिल्ली होते हुए कन्याकुमारी तक पहुंच जातीं और हमारी बोलने की आज़ादी छीन लेतीं तो यह आज के दौर में संभव नहीं। सीमा का छोटा-मोटा टुकड़ा इधर से उधर हो जाए, यह अलग बात है लेकिन किसी देश पर विदेशी सत्ता सेना के बल पर कब्जा कर ले, यह बहुत असंभव-सी कल्पना है। 1962 में चीन भारत पर भारी था लेकिन वह भी बहुत आगे नहीं बढ़ा, 1965 में भारत पाकिस्तान पर भारी था लेकिन वह भी आगे बढ़कर लौट आया। 1971 के युद्ध ने भले ही उपमहाद्वीप का नक्शा बदल दिया लेकिन वह इसलिए कि पूर्वी पाकिस्तान की बड़ी आबादी पाकिस्तान से अलग होना चाहती थी। उस मामले में भी भारतीय सेना मुजीब उर्रहमान को सत्ता सौंप कर लौट आई, वहां टिकी नहीं रही।

यदि यह सेना वाला मामला और ‘ऐंटीबायटिक से लेकर सर्जरी तक के इलाज’ वाला मामला छोड़ दें तो जज महोदया ने अपने फ़ैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है और कब कोई वक्तव्य राजद्रोह के घेरे में आ जाता है, इस पर भी प्रकाश डाला है जो काफ़ी उपयोगी हैं और इस मामले में जनता का दिमाग़ साफ़ करने में मदद करता है। उन्होंने ख़ुद तो कुछ नहीं कहा है लेकिन हाल के दो फ़ैसलों को उद्धृत किया है।

हार्दिक भरतभाई पटेल बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य 2016 (1) RCR (Criminal) 542 में राजद्रोह की परिभाषा पर न्यायाधीश का फ़ैसला (अंश)।
‘…मेरा मानना है कि यदि कोई वक्ता अपने भाषण या बयान के द्वारा श्रोताओं को हिंसा करने के लिए प्रेरित करता है तो पहली नज़र में कहा जा सकता है कि वह एक स्थापित सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह भड़काने के इरादे से ऐसा कर रहा है और यह भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के तहत अपराध बनता है।’ नीचे अंग्रेज़ी में मूल अंश पढ़ें।

श्रेया सिंघल बनाम भारतीय संघ (2015) 5 SCC 1 में वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विचार करते हुए माननीय जज के विचार (अंश)
‘… अब हमें इस पर विचार करना है कि वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जो सबसे आधारभूत मानवाधिकार है, उसके तहत क्या-क्या आता है। इसका दायरा समझने के लिए हमें इससे जुड़ी तीन अवधारणाओं को समझना होगा। पहली है विचार-विमर्श, दूसरी है हिमायत और तीसरी उकसावा। किसी ख़ास मक़सद (Cause), चाहे वह कितना भी अलोकप्रिय क्यों न हो, के बारे में किया गया विचार-विमर्श, यहां तक कि उसकी हिमायत भी अनुच्छेद 19(1) क के तहत स्वीकार्य है। हां, जब यह विचार-विमर्श या हिमायत उकसावे के स्तर पर आ जाए, तब वह अनुच्छेद 19(2) का मामला बन जाता है।’ नीचे अंग्रेज़ी में मूल अंश पढ़ें।
Speech
जिन्हें न मालूम हो, उनको बता दूं कि अनुच्छेद 19(1) हमें बोलने की आज़ादी देता है और अनुच्छेद 19(2) इस आज़ादी पर किन हालात में पाबंदी लगाई जा सकती है, उसकी बात करता है।
अब इन दो अंशों के आधार पर उन छात्रों के बारे में सोचिए जो अफ़ज़ल गुरु का पोस्टर अपने हाथों में लिए उनकी सज़ा को न्यायिक हत्या करार दे रहे थे। क्या यह एक विचार था? यदि हां तो इसकी तो अनुमति है चाहे यह विचार कितना भी अलोकप्रिय हो। क्या यह हिमायत थी? यदि हां तो वह भी अलाउड है। क्या यह उकसावा था? हां, ‘भारत की बरबादी तक जंग रहेगी, जंग चलेगी’ और ‘बंदूक से लेंगे आज़ादी’ को आप हिंसा के लिए उकसावे में रख सकते हैं। लेकिन वे सभी छात्र जो अफ़ज़ल का पोस्टर हाथ में लिए हुए थे, यह नारा नहीं लगा रहे थे। मेरी जानकारी से उमर ख़ालिद ने भी ‘भारत की बर्बादी’ या ‘बंदूक से लेंगे आज़ादी’ का नारा नहीं लगाया। जिन्होंने ये नारे लगाए, वे तो आज तक ग़िरफ्तार नहीं हुए।

students with Afzal posterअब इसी संदर्भ में कन्हैया कुमार के उस जवाब को समझिए जो उन्होंने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल पर दिया। उनसे पूछा गया था कि अफ़ज़ल गुरु के मामले में आपका स्टैंड क्या है। कन्हैया ने कहा, ‘अफ़ज़ल गुरु इस देश का नागरिक था, जिसे न्यायालय ने सज़ा दी। लेकिन जिस संविधान के तहत अफजल गुरु को सज़ा दी गई, वही हमें उस सजा के ख़िलाफ़ बोलने का अधिकार भी देता है। जो लोग अपनी असहमति जताना चाहते हैं, यह उनकी आज़ादी है।’

कन्हैया कुमार की यह बात ग़ौर करने लायक है। जो लोग सोचते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय दे दिया तो हर व्यक्ति को उसे सही मान लेना चाहिए, वे ग़लत सोचते हैं। आपको किसी भी कोर्ट के फ़ैसले के विरुद्ध बोलने का अधिकार है, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी। सुप्रीम कोर्ट भी अपने फ़ैसले के विरुद्ध अपील सुनता है। तो यदि आप उसके फ़ैसले को ग़लत नहीं मानेंगे तो अपील कैसे करेंगे? आपको याद होगा समलैंगिकों से जुड़े कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट अपनी राय दे चुका है लेकिन फिर से हाल ही में उस पर क्यूरेटिव पिटिशन डाली गई और वह सुनवाई के लिए राज़ी हो गया है।

जिन्हें इस आदेश को पूरा पढ़ने में रुचि हो वे यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

आधुनिक वैश्विय सभ्यता और नारी की गरीमा Modern Global Culture and Women

आधुनिक वैश्विय सभ्यता में प्राचीन काल में नारी की दशा एवम् स्तिथियों की प्रतिक्रिया में नारी की गतिशीलता अतिवादी के हत्थे चढ़ गयी. नारी को आज़ादी दी गयी, तो बिलकुल ही आजाद कर दिया गया. पुरुष से समानता दी गयी तो उसे पुरुष ही बना दिया गया. पुरुषों के कर्तव्यों का बोझ भी उस पर डाल दिया गया. उसे अधिकार बहुत दिए गए मगर उसका नारीत्व छीन कर. इस सबके बीच उसे सौभ्ग्य्वाश कुछ अच्छे अवसर भी मिले. अब यह कहा जा सकता है की पिछले डेढ़ सदी में औरत ने बहुत कुछ पाया है, बहुत तरक्की की है, बहुत सशक्त हुई है. उसे बहुत सारे अधिकार प्राप्त हुए हैं. कौमों और राष्ट्रों के उत्थान में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है जो आज देख कर आसानी से पता चलता है. लेकिन यह सिक्के का केवल एक पहलू है जो बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका दूसरा रुख़ भी ठीक से, गंभीरता से, ईमानदारी से देखें. अगर ऐसा नहीं किया और दूसरा पहलू देखे बिना कोई फ़ैसला कर लिया जाये तो नुक्सान का दायरा ख़ुद औरत से शुरू होकर समाज, व्यवस्था और पूरे विश्व तक पहुँच जायेगा.

आईये देखें सिक्के का दूसरा पहलू...

उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे
नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.

आईये देखते हैं कि आधुनिक सभ्यता ने नारी को क्या क्या दिया

व्यापक अपमान
  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन.
  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता... अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी... तथा फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण
  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व.
  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन.
  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के 'इस्तेमाल' के घिनावने और बेहूदा चित्र
  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.

(सवाल: अब आप नारी की इस स्थिति के समर्थक तो हो नहीं सकते, और अगर है तो क्या आप अपनी माँ-बहनों को ऐसा करने दे सकते हैं?)

यौन शोषण (Sexual Exploitation)
  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी 'सेवाएँ' अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.
  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी. सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण.
  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को 'नृत्य-साधना' का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई.
  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.

यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)
  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.
  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ.
  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place)
  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city)
  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण.
  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न.
  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.

यौन-अपराध
  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.
  • 'सामूहिक बलात्-दुष्कर्म' इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है.
  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी...
  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों.
  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं.
  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.

औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ
  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.
  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी मुल्व्वस (Incest).
  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.

कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)
बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र. पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा 'फीस' के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे. कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

सहमती यौन-क्रिया (Fornication)
  • अविवाहित रूप से नारी-पुरुष के बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध (Live-in-Relation) पाश्चात्य सभ्यता का ताज़ा तोह्फ़ा. स्त्री का सम्मानपूर्ण 'अपमान'.
  • स्त्री के नैतिक अस्तित्व के इस विघटन में न क़ानून को कुछ लेना देना, न ही नारी जाति के शुभ चिंतकों का कुछ लेना देना, न पूर्वी सभ्यता के गुण-गायकों का कुछ लेना देना, और न ही नारी स्वतंत्रता आन्दोलन के लोगों का कुछ लेना देना.
  • सहमती यौन-क्रिया (Fornication) की अनैतिकता को मानव-अधिकार (Human Right) नामक 'नैतिकता का मक़ाम हासिल.

समाधान
नारी के मूल अस्तित्व के बचाव में 'स्वच्छ सन्देश' की इस पहल में आईये, हम सब साथ हो और समाधान की ओर अग्रसर हों.

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.

नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.

लेकिन इस आव्हान से पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल. क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें???

आईये आज हम नारी को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की क़सम खाएं!

-सलीम खान
swachchhsandesh@gmail.com

बुधवार, 2 मार्च 2016

देशद्रोही= गरीब, मज़दूर, किसान, दलित और मुस्लिम Deshdrohi= Gareeb, Mazdoor, Kisan, Dalits and Muslims

 जेएनयू के जिन लोगों से देश को खतरा है। उनका परिचय बहुत जरूरी है।
जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार एक गरीब परिवार से हैं। बाप अपाहिज हैं। मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं। उनके कमाए तीन हजार रुपये से परिवार का पेट पलता है। 

राम नागा छात्रसंघ के महासचिव हैं। गरीब दलित परिवार से हैं। और भारत में भुखमरी के इलाके के रूप में कुख्यात कालाहाड़ी से आते हैं।
चिंटू कुमारी छात्रसंघ की पूर्व महासचिव हैं। वह बिहार के भोजपुर से हैं और दलित हैं। उनकी मां सरोजनी देवी चूड़ियां बेचने का काम करती हैं। सरोजनी जी को बेटी से अपने लिए घर नहीं चाहिए। वह चाहती हैं कि बेटी गरीब-गुरबों की मुक्ति की लड़ाई लड़े।
अनंत प्रकाश नारायण जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व उपाध्यक्ष हैं। यूपी के चंदौली से हैं और दलित परिवार से आते हैं। उनके परिजनों के पास दिल्ली आने भर तक का किराया नहीं है।
सबसे चर्चित चेहरा उमर खालिद का है। उमर नास्तिक हैं। उन्होंने येल विश्वविद्यालय की फेलोशिप के प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें दलितों और आदिवासियों के लिए काम करना था। 
इनमें से किसी के खिलाफ अभी तक दिल्ली पुलिस एक भी सबूत नहीं पेश कर सकी है। सबूत के नाम से जितनी चीजें सामने आयीं हैं या तो वो नकली साबित हो गयीं या फिर झूठी निकलीं। बावजूद इसके उन्हें देशद्रोही करार देकर पूरे देश में बदनाम कर दिया गया।
गरीब, मजदूर, किसान और दलित परिवारों से आने वाले ये बच्चे देशद्रोही हो गए हैं। लाखों करोड़ जनता का पैसा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा करने वाले सबसे बड़े देशभक्त। सरकार ने उन्हीं देशभक्त कारोबारी घरानों के एक हिस्से के 1 लाख 14 हजार करोड़ रुपये माफ कर दिए। न कहीं चूं हुई और न ही उस पर चर्चा। 
दरअसल बीजेपी ब्राह्मणवाद की कोख से पैदा हुई है। लिहाजा इसका बुनियादी चरित्र ही दलित, महिला और मुस्लिम विरोधी है। कारपोरेट परस्त होने के नाते मजदूरों, किसानों और नौजवानों से इसका 36 का रिश्ता है। केंद्र सरकार समस्याएं हल करने की जगह उसकी स्रोत बन गई है। समस्याओं को हल करने का उसका तरीका भी नायाब है। वह यह कि छोटी समस्या की जगह एक बड़ी समस्या खड़ी कर दो। सारे मोर्चों पर नाकाम मोदी को अब राष्ट्रवाद का ही सहारा है। इसकी आड़ में कारपोरेट की लूट भी चलती रहेगी और गरीबों, दलितों और मुसलमानों का दमन भी होता रहेगा। अनायास ही नहीं मोदी के निशाने पर सबसे पहले देश के उच्च शिक्षण संस्थान हैं। क्योंकि सबसे पहले, सबसे ज्यादा और सबसे तगड़ी चुनौती इन्हीं किलों से मिलने वाली है। इसलिए सरकार सबसे पहले इनको ही रौंद देना चाहती है। ऐसे ही नहीं हैदराबाद से लेकर जेएनयू और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर मद्रास आईआईटी तक सब इसके निशाने पर हैं।
दरअसल फासीवाद राष्ट्रवाद की भट्टी पर पकता है। लाशें उसके लिए ईंधन का काम करती हैं। हिंसा उसकी पहली शर्त है। लिहाजा देशभर में न केवल हिंसा हो रही है बल्कि उसके लिए पूरा माहौल भी बनाया जा रहा है। देखते ही देखते हरियाणा में तीन दिनों के भीतर 19 घरों के चिराग बुझ गए। विरोध करो तो देशद्रोह सड़क पर उतरो तो गोली। यह अब सरकार की घोषित नीति हो गई है। क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि हम जियाउलहक के दौर के पाकिस्तान में पहुंच गए हैं? और हिंदू पाकिस्तान हमारा लक्ष्य हो गया है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं का वजूद संकट में है। सुप्रीम कोर्ट तक के निर्देशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पुलिस मूक दर्शक है और सक्रिय है तो गोली चला रही है। विधायक सड़क पर उतर कर जनता पर हमले कर रहा है। पत्रकारों को सरेआम पीटा जा रहा है। लोकतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से चलता है। सस्थाएं उसका हाथ पैर होती हैं, उन्हें अपाहिज बनाकर लोकतंत्र को मौत के रास्ते पर ढकेला जा रहा है और पूरी व्यवस्था को गुंडों और दंगाइयों के हवाले करने की साजिश हो रही है।
लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। देश में 67 सालों से फला-फूला लोकतंत्र और उसके नागरिक इतने जल्दी घुटने नहीं टेकेंगे। इस देश ने अगर अंग्रेजों को भगाया है और इंदिरा के आपातकाल को नहीं बर्दाश्त किया, तो यह किसी तानाशाही को भी नहीं सहेगा। उसकी जगह इतिहास के कूड़ेदान में है। और देश की जनता उसे दिखा कर रहेगी।
नरेंद्र मोदी जी अंधराष्ट्रवाद की जिस भट्टी में आप पूरे देश को झोंक रहे हैं। ऐसा मत सोचिए कि आप उसमें महफूज रहेंगे। एक दिन ऐसा आएगा जब उसकी आंच आपको भी लगेगी। लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी हो। सब कुछ समाप्त हो गया रहा होगा। यही है फासीवाद जैसी प्रवृत्तियों का इतिहास। इसलिए भारत में इसको मत दोहराइये///

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

भक्त गाली क्यों देता है? Why Bhakt Abuses !!

मनोविज्ञान कहता है कि गालियां अक्सर हंसी-मज़ाक़ का आवरण ओढ़ कर आती है। आप अपशब्दों को मज़ाक़ की शक्कर में लपेट कर पेश कर देते हैं, पर ग़ौर से देखें तो भीतर ग़ुस्से में लिपटा लाल-पीला एक चेहरा दिखेगा। आप किसी का मज़ाक़ इसलिए उड़ाते हैं क्योंकि या तो आप उस व्यक्ति से डरते हैं, या फिर सामाजिक ‘शिष्टता’ की परवाह करते हैं। फ्रायड ने गालियों के बारे में कहा कि जिस बन्दे ने अपने दुश्मन को पत्थर से मारने की बजाय, गाली ‘फेंक’ कर मारा, उसी ने सभ्यता की नींव रखी!

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प्रतीकात्मक
आपने देखा होगा कि भक्त, और एक ख़ास क़िस्म के राजनीतिक भक्त जो कुछ दिनों से देश में जगह-जगह बेतहाशा गुलाटी मार रहे हैं, वह किसी तर्क में, वाद-विवाद, संवाद में जैसे ही ख़ुद को कमज़ोर पाते हैं, तुरंत गाली-गलौज पर उतर आते हैं। भक्त गाली क्यों देता है? क्या भक्त कायर, सामाजिक नैतिकता की परवाह करने वाला, सभ्यता का ख्याल रखने वाला एक संवेदनशील व्यक्ति है और उसे अपने बदतमीज़ और बदज़ुबान होने की इमेज की फ़िक्र होती है?

आप भक्त के भगवान को बुरा भला कहें, वे आपको गालियों से पाट देते हैं। ऐसा भी नहीं कि वे कोई क्रिएटिव गालियां देते हों, वही सदियों पुरानी गालियां जो इस देश का बच्चा-बच्चा छुटपन से ही गली मोहल्ले स्कूल में सुनता और दोहराता है। वैसे आपको बताऊं काशी में सबसे क्रिएटिव गालियां निर्मित और प्रयुक्त होती हैं। मिठाइयां और गालियां बनाने में बनारस का कोई जोड़ नहीं साहब! मुंह में ठूंसे हुए पान की पीक को भेदते हुए जब बनारसी ह्रदय से गाली का प्रवाह निकल पड़ता है, तो आनंद का जो दुर्लभ कॉम्बिनेशन बनता है, वो बाहरी लोगों को नसीब कहां! हो सकता है जल्दी ही कुछ बड्डे बाहरी लोगों को जल्दी ही नसीब हो जाए!

फ़िलहाल, थोड़ा विश्लेषण किया जाए कि भक्त गाली देते क्यों हैं? आइए, ज़रा इस अद्भुत जीव की अंतरात्मा में झांके तो, उसका भी दुःख दर्द समझें!

 1. भक्त अपने जीवन में लम्बे समय तक किसी मज़बूत बौद्धिक/भावनात्मक आधार के बग़ैर जी रहा होता है।
 2.  लम्बी जीवन यात्रा के बाद आख़िरकार उसे एक व्यक्ति, कोई काल्पनिक देवी-देवता या भोंडी विचारधारा प्राप्त होती है जो पायल झनकाती हुई उसके तनहा दिल के आकाश-से सूनेपन को एक झटके में भर देती है।  

 3. उसे अचानक गहरी मानसिक और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का अनुभव होने लगता है। एक ज़मीन मिलती है जहां वह खड़ा हो जाता है, ज़रूरत पड़ने पर आराम से बैठ भी जाता है, पालथी मार कर। चाहे तो शीर्षासन भी कर सकता है। बकालोलासन तो बड़े मजे से कर सकता है।

 4. वह गहन भक्ति भाव का अनुभव करता है। श्रद्धा, समर्पण, और उससे उपजे ‘आनंद’ में लहालोट होता है; दूसरों को अपने जैसा बना कर उसकी सुरक्षा का भाव और मजबूत हो जाता है। वह लगातार अपनी बौद्धिक और मानसिक ऊर्जा इस भक्ति भाव में इन्वेस्ट करता चला जाता है। अपने सभी वैचारिक और भावनात्मक अंडे वह एक ही टोकरी में भरता चला जाता है। अंध-भक्ति में उसे यह समझ नहीं आता कि जहां एक अंडा सड़ा हो, बाकी को तो सड़ना ही है। (शाकाहारी इसे अंडे की जगह सेब पढ़ें!)

abuse 5. एक दिन भक्त को अचानक कोई अ-भक्त मिलता है जो अपनी बौद्धिक और तार्किक क्षमता से उसके भक्ति भाव पर प्रहार करता है। भक्त तिलमिला उठता है। वह यह तो समझता है कि वह गलत है, पर उसके पास कोई चारा नहीं बचता। मूढ़ता की चट्टानों से सर टकरा-टकरा कर इतना श्रम और समय देकर उसने अपनी बुद्धि को कुंद किया होता है, कि अब वह चाहे तो भी रूठी हुई प्रज्ञा उसके पास लौट कर नहीं आ पाती। यदि आती भी है तो किसी साध्वी के रूप में। वह उसे नेस्तनाबूद कर देना चाहता है। पर सामाजिक, कानूनी व्यवस्था आसानी से इसकी अनुमति नहीं देती। तभी उसके कुंद मस्तिष्क में यह विचार उपजता है कि वह गाली गलौच का सहारा ले, जिससे वह भी बचा रहे और अ-भक्त भाग खड़ा हो; भक्त के पावों तले से खिसकी हुई ज़मीन वापस लौट आए।

abusing 2तो वह बल भर गरियाता है, अधिकतर गालियां अ-भक्त के परिवार वालों, स्त्री-पुरुषों के देह के अधोभाग में स्थित अंगों के विकृत नामों से उत्पन्न होती हैं। गाली देना भक्त की मजबूरी होती है। वह भक्त कोई संघी या भाजपाई हो यह ज़रूरी नहीं, वह मुल्ला, ओवैसी-वादी भी हो सकता है, मंदिर-मस्जिद के तबेले की भैंस या भैंसा हो सकता है, या फिर आशिक-माशूक भी हो सकता है। भक्त का रंग केसरिया हो ज़रूरी नहीं; कभी-कभी लाल और हरा तो अक्सर होता है। भक्त की कोई जाति नहीं होती; वह अवर्ण, कुवर्ण, सवर्ण कोई भी हो सकता है। पर गालियां तरह-तरह के धर्म और जाति को जोड़ने का अद्भुत काम करती हैं। सभी एक ही तरह की गालियां देते हैं। जैसे मधुशाला मेल कराती है, वैसे गालियां भी वैर ख़त्म करती हैं, और सभी को एक ही धरातल पर खड़ा करके मेल बढ़ा देती हैं।

साध्य कोई भी हो, साधक में क़रीब-क़रीब एक ही जैसे गुण पाए जाते हैं। जहां आई भक्ति, ग़ायब हुई दिमाग़ की शक्ति। गधे को आप चाहे जितना सिखा पढ़ा लो, वह अधिक से अधिक अच्छा गधा बन सकता है, पर रहेगा गधा ही; घोड़ा तो बनने से रहा।

abusing donkey
(डिस्क्लेमर: गधे का अपमान इस ब्लॉग लेखक का मक़सद नहीं। वह उसे घोड़े से बेहतर भी नहीं मानता। ये शब्द प्रतीकात्मक हैं और किसी जीवित या मृत इंसान इसे दिल पे लेकर नए सिरे से गालीबाज़ी न करने लगे। लेखक भक्ति की हद तक पशुप्रेमी है। गधा, उल्लू, बकरी, मुर्गा, सुअर, गाय या इस तरह के सभी प्रताड़ित जीवों का तो वह ख़ास तौर पर बहुतै बड़ा प्रेमी है!)


 डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. लेखक चैतन्य नागर
डूबते हुए सूरज ने कहा- 'मेरे बाद इस संसार में मार्ग कौन दिखलायेगा? कोई है जो अंधेरों से लड़ने का साहस रखता हो?' और फिर एक टिमटिमाता हुआ दीया आगे बढ़ कर बोला -- 'मैं सीमा भर कोशिश करूँगा!' - सलीम खान, लखनऊ/पीलीभीत, उत्तर प्रदेश Email: swachchhsandesh@gmail.com
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भारत में मुस्लिम आबादी कितनी है?