एक बार हिन्दू दोस्त ने मुझसे पूछा कि तुम्हें पता है, काबा भी हमारा ही है! मैंने कहा 'मैं कुछ समझा नहीं! आप कहना क्या चाहते हैं?' उस दोस्त ने कहा कि देखो मक्का में जो काबा है उसमें एक पत्थर लगा है और वह पत्थर ही भगवान शिव हैं और वह वहां विराजमान हैं! इसलिए तुम सब भी उन्ही की पूजा करते हो. देखो इस तस्वीर को (उसने एक तस्वीर दिखाई, जिसमें मुसलमान लोग उस पत्थर को चूम रहे थे). क्या तुम अब भी नहीं मानते कि यह पत्थर केवल मात्र पत्थर ही नहीं बल्कि भाग्वान शिव का साक्षात रूप है और तुम लोग भी इसे पूजते हो ! हालाँकि मुझे मालूम था कि वह जो कह रहा है, वह यूँ ही कह रहा है. बस बहस के तहत उसने यह कुतर्क बोला था. मैंने उस दोस्त से कहा, "दोस्त! अगर यही बात है तो तुम मुसलमान क्यूँ नहीं बन जाते और तुम भी जाओ उस पत्थर को चूमने"
मैंने यूँ ही किये गए सवाल का जवाब भी ऐसे ही दे दिया.
मुझे याद है बचपन में मेरे गाँव में मेरे हिन्दू दोस्त कहते थे कि उसके चाचा या बाबा यह कहते हैं कि तुम जिस काबा की पूजा करते हो उस्मने हमारे शिव भगवान् क़ैद है. कुछ दोस्त यह कहते कि वहां शिव जी ही हैं क्यूंकि वहां शिवलिंग लगा है!! उस वक़्त मैं कुछ भी जवाब न दे पाता क्यूँकि मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था.
जब बड़ा हुआ तो यही सवाल कुछ परिस्कृत रूप से पूजा जाने लगा कि जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काबा की तरफ़ मुहं करके नमाज़ क्यूँ पढ़ते हैं?
खैर, मैं हिन्दू भाईयों में अज्ञानतावश, या जानबूझकर कुतर्क के ज़रिये हमेशा से पूछे गए इस सवाल का जवाब देता हूँ कि काबा में भगवान शिव हैं, या मुस्लिम काबा के पत्थर अथवा काबा की पूजा करते हैं.
सबसे पहला जवाब है:
जब आप मानते हो कि वहां (मक्का के काबा में, मुसलमानों के इबादतगाह में) शिव हैं तो आप मुसलमान क्यूँ नहीं हो जाते? (The stone you are seeing in the Kaa'ba is called Hajr-e-Aswad)
दूसरा जवाब:
काबा मतलब किबला होता है जिसका मतलब है- वह दिशा जिधर मुखातिब होकर मुसलमान नमाज़ पढने के लिए खडे होते है, वह काबा की पूजा नही करते.
मुसलमान किसी के आगे नही झुकते, न ही पूजा करते हैं सिवाय अल्लाह के.
सुरह बकरा में अल्लाह सुबहान व तआला फरमाते हैं -
"ऐ रसूल, किबला बदलने के वास्ते बेशक तुम्हारा बार बार आसमान की तरफ़ मुहं करना हम देख रहे हैं तो हम ज़रूर तुमको ऐसे किबले की तरफ़ फेर देंगे कि तुम निहाल हो जाओ अच्छा तो नमाज़ ही में तुम मस्जिदे मोहतरम काबे की तरफ़ मुहं कर लो और ऐ मुसलमानों तुम जहाँ कहीं भी हो उसी की तरफ़ अपना मुहं कर लिया करो और जिन लोगों को किताब तौरेत वगैरह दी गई है वह बखूबी जानते है कि ये तब्दील किबले बहुत बजा व दुरुस्त हैं और उसके परवरदिगार की तरफ़ से है और जो कुछ वो लोग करते हैं उससे खुदा बेखबर नहीं." (अल-कुरान 2: 144)
इस्लाम एकता के साथ रहने का निर्देश देता है:
चुकि इस्लाम एक सच्चे ईश्वर यानि अल्लाह को मानता है और मुस्लमान जो कि एक ईश्वर यानि अल्लाह को मानते है इसलिए उनकी इबादत में भी एकता होना चाहिए और अगर ऐसा निर्देश कुरान में नही आता तो सम्भव था वो ऐसा नही करते और अगर किसी को नमाज़ पढने के लिए कहा जाता तो कोई उत्तर की तरफ़, कोई दक्षिण की तरफ़ अपना चेहरा करके नमाज़ अदा करना चाहता इसलिए उन्हें एक ही दिशा यानि काबा कि दिशा की तरफ़ मुहं करके नमाज़ अदा करने का हुक्म कुरान में आया. तो इस तरह से अगर कोई मुसलमान काबा के पूरब की तरफ़ रहता है तो वह पश्चिम यानि काबा की तरफ़ हो कर नमाज़ अदा करता है इसी तरह मुसलमान काबा के पश्चिम की तरफ़ रहता है तो वह पूरब यानि काबा की तरफ़ हो कर नमाज़ अदा करता है.
काबा दुनिया के नक्शे में बिल्कुल बीचो-बीच (मध्य- Center) स्थित है:
दुनिया में मुसलमान ही प्रथम थे जिन्होंने विश्व का नक्शा बनाया. उन्होंने दक्षिण (south facing) को upwards और उत्तर (north facing) को downwards करके नक्शा बनाया तो देखा कि काबा center में था. बाद में पश्चिमी भूगोलविद्दों ने दुनिया का नक्शा उत्तर (north facing) को upwards और दक्षिण (south facing) को downwards करके नक्शा बनाया. फ़िर भी अल्हम्दुलिल्लाह नए नक्शे में काबा दुनिया के center में है.
काबा का तवाफ़ (चक्कर लगाना) करना इस बात का सूचक है कि ईश्वर (अल्लाह) एक है:
जब मुसलमान मक्का में जाते है तो वो काबा (दुनिया के मध्य) के चारो और चक्कर लगते हैं (तवाफ़ करते हैं) यही क्रिया इस बात की सूचक है कि ईश्वर (अल्लाह) एक है.
काबा पर खड़े हो कर अजान दी जाती थी:
हज़रत मुहम्मद सल्ल. के ज़माने में लोग काबे पर खड़े हो कर लोगों को नमाज़ के लिए बुलाने वास्ते अजान देते थे. उनसे जो ये इल्जाम लगाते हैं कि मुस्लिम काबा कि पूजा करते है, से एक सवाल है कि कौन मूर्तिपूजक होगा जो अपनी आराध्य मूर्ति के ऊपर खडे हो उसकी पूजा करेगा. जवाब दीजिये?
वैसे इसका तीसरा और सबसे बेहतर जवाब भी है: हदीस में एक जगह लिखा है कि "हज़रत उमर (र.अ.) यह फ़रमाते हैं कि मैं इसे चूमता हूँ, क्यूंकि इसे हमारे प्यारे नबी (स.अ.व.) ने चूमा था, वरना यह सिर्फ एक पत्थर ही है इसके सिवा कुछ नहीं, यह मेरा ना लाभ कर सकता है, ना ही नुकसान."
-सलीम खान

37 पाठकों ने अपने विचार व्यक्त किये:
आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व अन्तिम अवतार मुहम्मद सल्ल0 ने कहा था कि हज्रे अस्वद (काला पत्थर) स्वर्ग से उतरा है (तिर्मिज़ी) और आज विज्ञान ने भी खोज करके सिद्ध कर दिया कि वास्तव में यह पत्थर जन्नती पत्थर है । इस खोज का सिहरा ब्रीटेन के एक वैज्ञानिक रिचर्ड डिबर्टन के सर जाता है जो स्वयं को मुस्लिम सिद्ध करते हुए काबा का दर्शन करने के लिए मक्का आया, वह अरबी भाषा जानता था । जब मक्का पहुंचा तो काबा में दाखिल हुआ और हज्रे अस्वद से एक टुकड़ा प्रप्त करने में सफल हो गया। उसे अपने साथ लंदन लाया और ज्यूलोजी की लिबार्ट्री में उस पर तजर्बा शुरू कर दिया। खोज के बाद इस परिणाम पर पहुंचा कि हज्रे अस्वद धरती के पत्थरों में से कोई पत्थर नहीं बल्कि आसमान से उतरा हुआ पत्थर है। और उसने अपनी पुस्तक ( मक्का और मदीना की यात्रा) में इस तथ्य को स्पष्ट किया। यह पुस्तक 1956 में अंग्रेजी भाषा में लंदन से प्रकाशित हुई।
देखिए (www.wathakker.com)पर प्रकाशित एक लेख।
इसी से यह बात सिद्ध हो गई कि किसी ने उसे आस्था से वहां ले जाकर नहीं डाल दिया कि वह शिव लिंग कहलाए बल्कि यह स्वर्गीय पत्थरों में से एक है। जिसे एक मुस्लिम प्रेम से चूमता है जैसे एक माता अपने बच्चे को , इसे पूजा का भी नाम नहीं दिया जा सकता। क्योंकि इसे चूमते समय किसी को लाभ की आशा अथवा हानि का भय नहीं होता। इसी लिए एक बार जब मुहम्मद सल्ल0 के एक प्यारे साथी और मुसलमानों के शासक अबूबक्र रज़ि0 काबा के पास आए तो हज्रे अस्वद को चूमते हुए कहा ( मैं जानता हूं कि तो मात्र एक पत्थर है। तू न लाभ पहुंचा सकता हैं और न हानि, यदि मैं ने मुहम्मद सल्ल0 को चूमते हुए न देखा होता तो मैं तुझे न चूमता) ज्ञात यह हुआ कि आज एक मुसलमान उस पत्थर को केवल पत्थर मान कर ही चूमता है क्योंकि वह पत्थर स्वर्गीय पत्थर है और हमारे अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 ने उसे चूमा था उन्हीं का अनुसरण करते हैं और बस।
सही कहा आपने, यह प्रमाणिक है...
यार आपको एक बात बतलाएँ जितने भी धर्म आए ना उनका एक ही काम था जो ये कह रहे हैं उसके उलट बात करो। न क़ाबा के इलाके के लोगों को शिव का पता था और ना शिव के इलाके (कैलाश) के लोगों को मक्का मदीना पता था। यहाँ वहाँ की बातों से और अनुभवों से ये सब धर्मग्रंथ रच डाले और एक दुसरे की बात काटकर अपनी दूकान चलाने लगे। चलो यदि क़ाबा महज़ एक पत्थर है और आप उसे चूमते हैं तो हिन्दुओं ने जितने पत्थर भगवान समझ कर लगा रखे हैं उन्हें सारे मुसलमान चूमना शुरू कर दें जब आप यह कहते हो यदि क़ाबा शिव है तो वे मुसलमान क्यों नहीं बन जाते। हम मुसलमान ख़ु़द तो शादी करते हैं बीबी एक नहीं चार भी रख लेते हैं, वालिदैन भी ज़रूरी हैं हमारे लिए, समाज भी चाहिए हमें मगर बात जब अल्लाह मियाँ पे आती है तो उनको अकेला कर डालते हैं हम लोग। (अल्लाह एक है) उनसे सब पर रहम करने को कहा जाता है पर हम सब लोग याने इंसान कभी प्यारे अल्लाह मियाँ पर रहम करते हैं ? रहम करो उन पर मत लड़ो यार मत लड़ो।
हज़रत नूह हमारे पास हैं तो वही के वही नोहा बनकर ईसाइयों के पास हैं और आप जानते हैं के हिन्दुओं के मनू ऋषि की कहानी भी सेम टु सेम। फिर हम अलग कैसे हुए ?
फ़ीअमानिल्लाह
अरे भाई...बवाल.....कभी तो सही टिप्पणी कर दिया करो....हमेशा बेमतलब टिप्पणी ही करते हो....
कभी तो अपनी बात सही तरह से बताया करो...अरे वो ईश्वर ही क्या जो जना जाये और किसी को जने...फ़िर इन्सान और उसमें फ़र्क क्या रह गया?
दुनिया के सारे धर्मगर्न्थ इन्सानों ने लिखे सिवाय कुरआन के...वो अल्लाह का कलाम है...और ये बात हर तरह से साबित हो चुकी है...
इस्लाम को और जानने के लिये मेरे ब्लोग http://qur-aninhindi.blogspot.com पर तशरीफ़ लायें
आपने अपने ब्लौग को वोट देने के लिए चार रेटिंग राखी हैं १-ज्ञानवर्धक, २-औसत, ३-ठीक है, ४-नहीं मालूम.
मेरी राय में आपको पांचवी रेटिंग भी रखनी चाहिए 'निहायत ही घटिया'.
इन्टरनेट चलाने और ब्लौग बनाने लायक अकल आ जाने के बावजूद आपमें फिरकापरस्ती कायम है. इन सब बातों का ज़िक्र यहाँ करके आपको यह लग रहा होगा की आप बेहद अक्लमंद साबित होंगे और आप इस्लाम की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं तो मैं कहूँगी की आप अभी भी सातवीं शताब्दी से आगे नहीं बढे हैं. मुझे तो लग रहा है की अनपढ़ मुसलमान से नहीं बल्कि आप जैसे पढ़े-लिखे मुस्लमान से ज्यादा खतरा है जिसे इतना इल्म नहीं है की बेसिरपैर की बातों को अपनी ब्लौग पोस्ट बनाकर सिर्फ सनसनी ही पैदा की जा सकती है, कोई लाभ नहीं मिलता.
वैसे हिन्दू एक बात पर एकमत हैं की इस्लाम दुनिया में सिर्फ १५०० साल के लिए आया है. चन्द साल बचे हैं आप लोगों को, चैन से जियें और जीने दें.
वैसे ये मानने में क्या बुराई है कि शिवलिंग काबा में है.. क्या घट जायेगा.. और आप धर्म बदलने की बात क्यों करतें है.. आप मानते है कि इश्वर एक है तो फिर सभी धर्म वाले चाहे किसी की पूजा करे अंत में तो इश्वर की ही पूजा करते है न.. जैसे आप मानते है कि जो आप कर रहे है वो श्रेष्ठ है वैसा दुसरे भी मानते है..
वैसे अगर ग्रिनविच मीन टाइम में खामियां है तो आप कौनसा समय मानते हैं? काबा मीन टाइम?
सलीम भाई, आपकी सारी बाते १००% सही हो सकती है, मुझे कोई संदेह नहीं ! मगर आप और आपके अन्य मित्र क्या एक बात का इमानदारी से जबाब दे सकते है कि अगर इस्लाम इतना ही उच्चकोटि का धर्म था/ है, अगर इस्लाम और कुरान की शिक्षाये इतनी बेहतर किस्म की है तो इस दुनिया में अगर सारी नहीं तो ज्यादातर समस्याए फिर इस्लाम से ही क्यों जुडी है ? बड़े भाई, अन्दर क्या है वह ज्यादा अहमियत नहीं रखता, सामने व्यावहारिक पटल पर क्या दीखता है, वह ज्यादा अहमियत रखता है !
मैं कल जब आपकी वह इस्लामिक बैंक वाली पोस्ट पढ़ रहा था तो मुझे हंसी आ रही थी, गनीमत समझो कि आप इस देश में तथाकथित अल्पसंख्यक हो इसलिए इस्लाम की खुलकर पैरवी कर पा रहे है, बहुसंख्यक हिन्दू होते और कोई हिन्दू बैंकिंग प्रणाली की बात करते तो अब तक हमारे ये ताथाकथित सेकुलर, तमाशा खडा कर चुके होते ! दुसरे शब्दों में अगर कोई हिन्दू पकिस्तान में किसी हिन्दू मान्यता की बात करता तो अब तक तो .....!
इंसाअल्हा, खुदा सबको सद्बुद्धि दे !
भाइयो ! मात्र मुस्लिम वह समुदाय है धरती पर जिनको अपने ईश्वर ( अल्लाह) का ज्ञान प्राप्त है। इसी लिए वह मात्र एक ईश्वर की पूजा करते हैं क्योंकि वह समझते हैं कि इस संसार का पैदा करने वाला,मानव की रचना करने वाला, विश्व को चलाने वाला मात्र एक अल्लाह है और हम सब इस धरती पर परीक्षा के लिए बसाए गए हैं एक दिन आने वाला है कि सारी सृष्टी ईश्वर के दरबार में एकत्र होगी और उनके कर्मो का लेखा जोखा लिया जाएगा- फिर या तो स्वर्ग है अथवा नरक।
हमें सत्य का पता है और हर मुस्लिम को सत्य का ज्ञान है इसी लिए हम इन बातों को खान-पान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण समझते हैं। इस्लाम प्रत्येक मानव का धर्म है और ज़ाहिर है कि जो लोग इसे नहीं जान रहे हैं इसका विरोध तो करेंगे ही।
आज लोग स्वयं मानव की पूजा कर रहे हैं औऱ समझ रहे हैं कि मैं ईश्वर की पूजा कर रहा हूं------ ऐसा क्यों हुआ ? मैं आपको बताता हूं अवतार की कल्पना लोगों ने अपनाई और समझने लगे कि कृष्ण जी ईश्वर का अवतार ले कर आए थे इस लिए इनकी पूजा ईश्वर की पूजा है -- लेकिन मात्र कल्पना से कोई बात नहीं बनती इस तर्क में कितना दम है इसे भी देखना चाहिए --- श्री राम शर्मा कल्कि-पुराण के 278 पृष्ठ पर अवतार की परिभाषा इस प्रकार करते हैं ( समाज की गिरी हुई दशा में उन्नती की ओर लो जाने वाला महामानव नेता) अर्थात मानव में से महान नेता जिनको ईश्वर मानव मार्गदर्शन हेतु चुनता हैं। ज्ञात यह हुआ कि ईश्वर धरती पर मानव रूप ले कर नहीं आया बल्कि मानव में से ही कुछ लोगों को संदेष्टा घोषित किया, और आकाशीय दूतों द्वारा उनपर अपना संदेश उतारा ताकि लोगों का मार्गदर्शन करें, उनको कुछ चमत्कारियां भी दी गईं जिनको देख कर लोगों ने उन्हीं को ईश्वर के रूप में मान लिया और उन्हीं की पूजा करने लगे। शायद समझ में आ गया होगा कि मुर्ति-पूजा क्यों और कैसे शुरू हुई। सब से अन्त में ईश्वर ने सम्पूर्ण मानव के मार्गदर्शन हेतु कल्कि अवतार को भेजा जो मक्का में पैदा हुए और जिनकी आगमन की प्रतीक्षा आज तक हिन्दू समाज में हो रही है हालांकि वह आ चुके -- विस्तृत जानतकारी के लिए डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय की पुस्तक कल्कि अवतार और मुहम्मद सल्ल0 का अध्ययन कर लें ।
भाइयो !मैं कोई अलग पथ की ओर आप को निमंत्रन नहीं दे रहा हूं बल्कि यह आपकी अमानत है जिसे में आप तक पहुंचाना चाहता हूं। जो लोग इन बातों का विरोद्ध करते हैं वह वास्तव में अपने ही ईश्वर का विरोद्ध कर रहे हैं । यदि आप इन बातों पर चिंतन मनन करते हैं तो हमें इसका कोई लाभ नहीं होने वाला है आपका ही अन्तिम जीवन सुधरेगा।
आधुनिक ज्ञान के आधार पर बच्चा-बच्चा जानता है कि धरती गोल है। किसी गोल चीज का केन्द्र कहां होता है आपको पता होगी। यदि यह पता होगी तो यह भी पता होगा कि काबा धरती के केन्द्र में नहीं है।
धरती के सतह पर किसी स्थान को 'केन्द्र' कहना मूर्खता है।
@ Jyotsna जी,
आपने कहा "वैसे हिन्दू एक बात पर एकमत हैं की इस्लाम दुनिया में सिर्फ १५०० साल के लिए आया है. चन्द साल बचे हैं आप लोगों को, चैन से जियें और जीने दें.
ये आपकी और सारे सनातन (हिन्दु) समाज की बहुत बडी गलतफ़हमी है जिसको मैं दुर कर देता हूं...
कुरआन और सही हदीस में साफ़ ज़िक्र है...---- की "कयामत तब आयेगी जब मर्द और औरत खुलेआम सडंक पर "ज़िना"(सहवास) करेंगे और उस वक्त वो इन्सान जन्नत मे जायेगा जो उनसे कहेगा की ज़रा सडक के किनारे हो जाओ।
कयामत आने से पहले "दज्जाल" आयेगा जिसकी एक आंख नही होगी वो दुनिया में एक जन्नत और जहन्नुम बनायेगा और अपने आपको खुदा कहेगा....जो उसकी जन्नत में जाना कुबुल करेगा वो अल्लाह की जहन्नुम में जायेगा और जो उसको खुदा मानने से इन्कार करेगा वो उसकी जहन्नुम और अल्लाह् की जन्नत में जायेगा। वो चालीस साल राज करेगा दुनिया पर...
उसके बाद "ईसा अलैहिस्सलाम" (ईसा मसीह) दुनिया में आयेंगे और उसको खत्म करेंगे...फिर ईसाईयों को बतायेंगे की मैं अल्लाह या खुदा का बेटा नही हूं...मैं तो सिर्फ़ उनका पैगम्बर हूं....और फिर पूरी दुनिया में १०० साल तक इस्लाम की हुकुमत होगी...उसके बाद कयामत आयेगी
इस ब्लोग को पढ़ा, मैं हर धर्म का सम्मान करता हूँ, और लगा शायद यहाँ इस्लाम से संबंधित कुछ अच्छा पढ़ने को मिलेगा पर पता चला कि इस्लाम के नाम पर केवल दुकान लगा रखी है, अरे भाई लोगों तर्क करने से या किसी के धर्म बदलवा लेने मात्र से धर्म का महत्व नहीं बड़ जाता है। भगवान एक है मेरा तो यही मानना है और अगर धर्म का महत्व इस्लाम समाज इतनी अच्छी तरह से समझता है तो कौन से धर्म ग्रंथ में यह लिखा है कि जाओ हत्याएँ करो, बम फ़ोड़ो, मुँबई पर हमला करो। दरअसल इस्लाम को इस्लामिक लोगों ने ही विकृत रुप देकर अपना उल्लू सीधा किया है।
कोई भी धर्म ग्रंथ कहीं भी यह नहीं कहता कि दूसरे का खून करो, सोचें और जबाब दें।
शीघ्र ही मेरा अगला लेख पढ़े "जिहाद का वर्णन भगवत गीता में भी"
जिहाद का मायने क्या है? क्या जिहाद का ज़िक्र कुरआन में ही है या दुसरे धर्मों की किताबों में भी है? क्या श्री कृष्ण ने भी जिहाद करने का हुक़्म दिया है या नहीं? क्या किसी एक ही काम के दो संबोधन देना उचित है अर्थात शहीद भगत सिंह को अँगरेज़ आतंकवादी कहते हैं और हम देशभक्त? आखिर कौन सही है? साध्वी प्रज्ञा को सीबीआई आतंकवादी कहती है! क्या वह वाकई आतंकवादी है? ओसामा बिन लादेन को अँगरेज़ आतंवादी कहते हैं ! क्या वह वाकई आतंकवादी है?
इन सभी सवालों का जवाब हैं, मेरा अगला पोस्ट!!
"जिहाद का वर्णन भगवत गीता में भी"
आप तो सारे वर्णन अपने शब्दों में करते हैं जो आपको पसंद हो वो स्टेटमेंट अपने शब्दों में तोड़ मरोड़ कर लिख देते हैं, चलिये तब भी आपके अगले लेख "जिहाद..." का इंतजार है।
मियां काशिफ, तुमने बड़ी तफसील से लिखा है:-
"कुरआन और सही हदीस में साफ़ ज़िक्र है...---- की "कयामत तब आयेगी जब मर्द और औरत खुलेआम सडंक पर "ज़िना"(सहवास) करेंगे और उस वक्त वो इन्सान जन्नत मे जायेगा जो उनसे कहेगा की ज़रा सडक के किनारे हो जाओ।
कयामत आने से पहले "दज्जाल" आयेगा जिसकी एक आंख नही होगी वो दुनिया में एक जन्नत और जहन्नुम बनायेगा और अपने आपको खुदा कहेगा....जो उसकी जन्नत में जाना कुबुल करेगा वो अल्लाह की जहन्नुम में जायेगा और जो उसको खुदा मानने से इन्कार करेगा वो उसकी जहन्नुम और अल्लाह् की जन्नत में जायेगा। वो चालीस साल राज करेगा दुनिया पर...
उसके बाद "ईसा अलैहिस्सलाम" (ईसा मसीह) दुनिया में आयेंगे और उसको खत्म करेंगे...फिर ईसाईयों को बतायेंगे की मैं अल्लाह या खुदा का बेटा नही हूं...मैं तो सिर्फ़ उनका पैगम्बर हूं....और फिर पूरी दुनिया में १०० साल तक इस्लाम की हुकुमत होगी...उसके बाद कयामत आयेगी"
फुल कॉमेडी है तुम्हारी कुरान और हदीस में कही बातें. भाईजान, कोई बेवकूफ ही इस तरह की इंडिया टी वी छाप बातों में यकीन कर सकता है. पूरी दुनिया में जब मुसलमानों की वाट लग रही है तब तो तुम्हारा अल्लाह जन्नत में हूरों के साथ रंगरलियाँ मना रहा है! कौन ऐसी बेसिरपैर की बातों में यकीन करेगा!
तुम लोग तो छोडो ये कम्प्युटर और ब्लॉगिंग वगैरह. ये कतई इस्लामी नहीं हैं. कबीलाई धर्म को माननेवाले हो तुम लोग, तुम्हें ये जादू-टोटके जैसी बातें ही समझ में आती होंगी.
दूसरों को पागल समझा है क्या?
Jyotsna...
you know what ? tum islam ke kafi kareeb aa chuki ho... ab adiyal saand ki tarah mat bano. khud se pucho ke tumne kya paya yahan aa kar .. or kya follow kar rahi ho
is dikhave se dur raho... hakiqat mein tum jo thi woh ab nahi.. tum sidhi raah per ho .. kyun janbujh kar us raah per chalna chah rahi ho .. jisko shaitaniyat ki raah kehte hein... ... kisi or ki di huyee taklif kisi or jagah darshana bewakufi hei... zara dhyan se J. ... badla lene ka yeh tarika galat hei tumhara
इस्लाम तो है ही कबीलाई पन्थ/मज़हब (धर्म नहीं) आगे कुछ कहना ही व्यर्थ है।;गीता का ज़िहाद अपने ही भाइयों के विरुद्ध है,अपने ही धर्म में, उनके अन्याय के विरुद्ध;न कि अन्य धर्म के विरुद्ध,उसका आतंकवाद से तुलना मूर्खता ही है।
kyon pareshan hota hai?meri kament ko suresh ke blog par ja kar padhle. use maine jo jawab diya hai tu khush ho jaega.use kah dena ki ab ayodhya ki tarha kabe par halla bol ne ki taqat rakhta hai to pahle suresha ko lider banado.uski faat javegi.
अल्हम्दुलिल्लाह की दुनिया कितनी बडी थी? क्योकि मक्का-मदीना न तो एशिया के मध्य मे है, न युरेशिया के, और न ही दुनिया के| और यह भी देखिये कि आप उत्तर दक्षिण का मध्य पता कर सकते है, पूरब - पश्चिम का नही| क्या अल्हम्दुलिल्लाह यह समझते थे कि दुनिया एक प्लेट की तरह है?
O Katua saala shri KishenKi tulna tu Jahhad ka saath mat kar woh dhram uyudh tha woh ahchaai ka Burai se uyuth(war) tha. Osaama Bin Ladan to Nirdosho ko Maratha hai woh to Ravaan ka samman hai woh to kanse ka samman hai. Bhakti to Ravan Ne Bhi Ki thi par wo doosara bakassore Bhakto ko marta (kill) tha. ossam bin ladane bhi yahee kar raha hai aur Tuu Mujha usi ka eak Rachas danav hai chinta mat kar yeh ossama bin ladane awashey maara jayga. Islaam ka naam par bakassor logo ko marrne vala tere jase rakshas ka Bhi anat hoga. Jo atangwadi ko atangwadi nahi maanta hai. Bulki uska saath deta ho. tera jaisi Ghdaaar ko to pakada kar aur hath paer bandh kar Pagal dogs ka paas Chod dena chayia Har kisi anthakwadi Ka yahi harsh hona Chaahiya Tu Bhi unhi aatankwadiyo ma sa eak hai ba. tujha dharti par jeena ka koi adhikar nahi hai. Tera jaisa logo ka karan hi Islaam ko Anthankwadi manna jata hai aur muslimo par dought kiya jata hai.
saleem tara jaisa Is desh ka dushman hai jo kahta hai ki ausma bin ladane aantakwadi nahi Balki dhram uyudh kar raha hai Tujhe Bhi Jehhad ki sana ma Bharti ho janna chayia Tu Indian kahlaane ka layak Nahi hai. tumahra jaisa aantakwadiyo ko maarna ka liya hi Bhagwaan shri kishan ka Janam hota hai. Na ki tum Jaisa Pappiyoa ka saath dana ka liya
saleem jaroor padhna
http://www.hindusthangaurav.com/books/jihad%20ke%20pralobhan%20sex%20&%20loot.pdf
Jyotsana ji ,jadu tona to aapki shaan ki hai ,har DHARMIK KAAND ke liye paisa lagana parta hai, Islam mian IBADAT karne Main kuch kharch nahi hota, aap comuter bloging internet chorne ki baat kar rahi ho,tozara ye bataye aapne in sabko apnakar kaunsa teer maar liya.bus munh na khulwaye for example TASLIM ka taaza blog padh lena, BAAT KAM KIJE ZAHANAT KO CHUPATE RAHIYE....
सलीम साहब ! कुरान मनगढ़ंत है ,किबला लिखने वाले को ये नहीं पता था की दुनिया गोल है तुम जिधर भी पैर करो लात उसे हे दिखाओगे ,एक काम करो आज से सर नीचे और पैर आसमान तरफ के या खड़े खड़े सोया करो !
स्वस्थ वैज्ञानिक बहस की इस्लाम में गुंजाईश कम ही दिखती है. इस्लाम का चश्मा आँखों पर चढ़ा कर और हाथ में हदीस की तलवार लेकर तर्क नहीं हो सकता. इतिहास साक्षी है कि इस्लाम ने ऐसी कितनी ही विकसित सभ्यताओं को पद दलित किया ही जो इसके विचारों से सहमत नहीं थीं. पर अब समय बदल चुका है. तर्क, दर्शन और मीमांसा को जीवन पद्धति बनाने वाला भारत-पुत्रों का समाज अतिआधुनिक सोच के साथ साथ अति आधुनिक सैन्य व्यवस्था का भी स्वामित्व रखता है.
कुतर्क और हठधर्मिता को सीमित, स्वार्थपरक सोच रखने वाले राजनितिक दल भले ही सर-माथे पर रखें, आधुनिक और विश्व-परक विचारों वाला भारतीय युवा इस के सामने अब माथा नहीं टेकने वाला.
हिम्मत जुटाएं और अपने धार्मिक ग्रंथों को तर्क की कसौटी पर कस कर देखें. उत्तर वहीँ छिपे हैं. कुतर्कों के पीछे मुंह छिपाने से 'शेख-चिल्ली' 'कालिदास' नहीं बन जाता.
hahhaahhhaaa
aur kya kahun apki bewkufi par...
aap jaise log hi hain jo ye to mante hain ki khuda ek hai..par ye nahi mante ki usne sirf insan ko banaya hai...bantne wala to khud insan hai...apne kuran to padhi hai kintu use samajh nahi pae...aap jaise log hi hain jo antakwad ko naam jehad ka dete hain...aur puri muslim communitie ko badnam karte hain...sabse pahle aap har dharm ke granth padhe jo aapke liye mumkin hi nahi hai...kyonki hindu dharm itna vishal hai aur itna purana hai...ki aapko ise samjhne ke liye kai janam lene padenge...kyonki jo insan shri karishna ki hi mater insan manta hai uski mansikta kitni nimn sater ki hogi andaza lagana asan hai...
खुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो यां भी वही काफिर सनम निकले...
....सनम=मूर्ति
Saleem tu siya musalman hai ya suni musalman hai? Saleem agar Hamari sarkare itne nikammi na hoti to tu itne bakwas na kar pata. Agar tujhe apane musalman hone par itna phakra hai to kise musalman desh me ja, yaha alp kyo banahua hai bahu banja, mahari roti me se hisa khata hai aur hamari dharam ko galat tharata hai.
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////////कयामत आने से पहले "दज्जाल" आयेगा जिसकी एक आंख नही होगी वो दुनिया में एक जन्नत और जहन्नुम बनायेगा और अपने आपको खुदा कहेगा....जो उसकी जन्नत में जाना कुबुल करेगा वो अल्लाह की जहन्नुम में जायेगा और जो उसको खुदा मानने से इन्कार करेगा वो उसकी जहन्नुम और अल्लाह् की जन्नत में जायेगा। वो चालीस साल राज करेगा दुनिया पर...///////
एक आँख नहीं अपितु एक सींग कहा गया है .और शायद वो कोई और नहीं ओसामा बिन लादेन ही है सारे मुस्लिम उसकी बनाई गयी जन्नत में हिं और गैर मुस्लिम उसकी बनाई गयी जहन्नुम में .................४० वर्ष समाप्त होने वाले हैं
////////कयामत आने से पहले "दज्जाल" आयेगा जिसकी एक आंख नही होगी वो दुनिया में एक जन्नत और जहन्नुम बनायेगा और अपने आपको खुदा कहेगा....जो उसकी जन्नत में जाना कुबुल करेगा वो अल्लाह की जहन्नुम में जायेगा और जो उसको खुदा मानने से इन्कार करेगा वो उसकी जहन्नुम और अल्लाह् की जन्नत में जायेगा। वो चालीस साल राज करेगा दुनिया पर...///////
एक आँख नहीं अपितु एक सींग कहा गया है .और शायद वो कोई और नहीं ओसामा बिन लादेन ही है सारे मुस्लिम उसकी बनाई गयी जन्नत में हिं और गैर मुस्लिम उसकी बनाई गयी जहन्नुम में .................४० वर्ष समाप्त होने वाले हैं
काश इस पोस्ट पर समझदार लोग भी आया करें, जब देखो तब वही घिसी पिटी बातें, पूरी दुनिया परेशान है इस शांति के प्रवाह से, आज इस धर्म का अमेरिका क्या लाभ उठा रहा है इसको समझने के लिए बचपन की एक कहानी का ज़िक्र करना समसामयिक होगा, एक जंगल में दो बिल्लियाँ जा रही थी उन्हें एक रोटी (आज की तारीख में पेट्रोल) पडी मिली उसके बटवारे के लिए दोनों में झगडा होने लगा, बात सुलझते ना देख उन्हें एक काजी की जरुरत महसूस हुई संयोग से वहां से एक बन्दर गुजर रहा था दोनों बिल्लियों ने उससे अपनी समस्या बताई उसने एक तराजू का इंतजाम किया और फिर चालाकी के साथ कभी एक टुकडा का कर देता तो ज्यादा वाले को खाकर बराबर करने का ढोंग करता फिर दूसरी को कम कर देता इस तरह वह पूरी रोटी पचा गया दोनों बिल्लियाँ अपना सा मुंह लेकर अपने अपने रास्ते चली गयी, यही हॉल अमेरिका इन मुस्लिम देशों के साथ कर रहा है कभी ईराक पर हमला करता है तुर्की, कुवैत, आदि की मदद लेकर इस बार हमला बोल दिया है लीबिया पर और मदद है खु लीबियाई विद्रोहियों की और क़तर की इस तरह मरेंगे दोनों हाल में मुसलमान ही, जब इस्लाम में हर समस्या का निदान एक किताब करने मैं सक्षम है तो इन समस्यायों को क्यों नहीं सुलझाया जा रहा, दुसरे धर्मों को सीख देने से पहले ये खुद कुछ सीख ले ले. दुनिया में इससे ज्यादा हास्यास्पद बात कुछ हो ही नहीं सकती की दुनिया को समझदारी सिखाने का दावा करनेवाले ये इस्लाम के ठेकेदार अपने ही भाइयों को समझदार नहीं बना पा रहे.
मेरा मतलब कुछ समझदार मुस्लिम लोगों से है, चाहे वे एक प्रतिशत हों, क्योंकि हिन्दुओं में समझदार आसानी से मिल जाते है. हाँ एकाध प्रतिशत हिदू भी नासमझ हो सकते है.
हजरे अस्वद (काला पत्थर) कि हक़ीक़त
चूँकि मेरा यह ब्लॉग केवल अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के जीवन के सत्य तथ्यों के बयान पर आधारित है अतः मैं किसी भी अतिरिक्त लेख से परहेज़ करता हूँ एवं कोशिश यह होती है कि आप के जीवन के उन्हीं तथ्वों को बयान करूँ जो सही रवायतों पर आधारित हैं लेकिन कुछ समय पूर्व मैंने हजरे अस्वद एवं काबा के बारे में कुछ नकारात्मक विचार वाले व्यतियों जिनका ज्ञान सरल तथा गलत विचारों एवं सोंच से भरपूर है के लेख तथा उनपर कमेंट्स पढ़ा इन आलेखों में ख़ास तौर से हजरे अस्वद के बारे में जो बकवास कि गई है वोह लेखक के मानसिक बिमारी का उदहारण है काबा तथा हजरे अस्वद का तअल्लुक़ किसी सनातन धर्म अथवा शिव या शिव लिंग से क्या हो सकता है ?दर असल लेखक ने झूटे इतिहास कारों की झूटी बातों पर भरोसा करके जिनका कोई अस्तित्व नहीं है एक अफसाना तराश कर लेख का रूप दे दिया है . ऐसे लोग जिन का ज्ञान सरल तथा कमज़ोर होता है जो सत्य असत्य में अंतर नहीं कर सकते और न ही करने की कोशिश करते हैं झूटी बातों को इतिहास का रूप देनें वाले इतिहासकारो की हर सच्ची झूटी बातों को सत्य समझ कर उसपर ईमान ले आते हैं, ठीक उस अबोध बच्चे की तरह जो दादी माँ की परियों तथा देवों की कथाओं को सच समझ बैठता है और दिनों रात उन्हीं के सपने देखा करता है
चूँकि हमारे इस्लाम धर्म में किसी भी धर्म का ठठा तथा उस से सम्बंधित किसी चीज़ का मजाक उड़ाना निषेध है इसलिए मैं सनातन अथवा शिव एवं शिवलिंग की सत्यता अथवा असत्यता के बारे में कुछ नहीं कहूंगा हाँ इतना ज़रूर है कि हमारे धर्म के बारे में जो असत्य तथा अन्याय पूर्ण बातें कही जाती हैं उनका उत्तर अवश्य दिया जाए! काबा कि हकीकत के बारे में मैं इस से पूर्व लिख चूका हूँ तथा मौक़ा मिला और अल्लाह ने चाहा तो मक्का फतह करने के बयान के समय लिखूंगा
अब निम्न में हजरे अस्वद के बारे में जो सत्यता है उसे बयान कर रहा हूँ इस यकीन के साथ कि जितना ब्यान कर रहा हूँ केवल उतना ही सत्य तथा कुरआन (इश्वर के बयान) एवं हदीस (नबी की बातों तथा कार्यों) से साबित है जिन्हें आप सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के प्यारे साथियों रज़ीअल्लाहोअन्हुम ने देखा , सुना ,समझा तथा ब्यान किया है बाक़ी सब बे सर पैर की बातें एवं अफ़साना है , अल्लाह हमें सही सोंच दे
हजरे अस्वद क्या है ? : हजरे अस्वद काबा के दक्षनी कोने में मौजूद लाली मिला हुआ एक काला पत्थर है जो ज़मीन से डेढ़ मीटर की उंचाई पर काबा की दिवार में लगा हुआ है. यहाँ यह बताते चलें कि शुरू में हजरे अस्वद का आकार तीस सेंटी मीटर के करीब था लेकिन अनेक घटनाओं की वजह से उस में परिवर्तन आता गया तथा अब अनेक साईज़ के केवल आठ छोटे छोटे टुकड़े बचे हैं जिन में सब से बड़ा छोहारे के आकार का है , यह तमाम टुकड़े करीब ढाई फिट के कुतर में जड़े हुए हैं जिनके किनारे चांदी के गोल चक्कर घेरे हुए है. इस की हिफाज़त के लिए सब से पहले जिसने उसे चांदी से गच दिया वो अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ियल्लाहो अन्हो हैं फिर बाद के राजाओं महाराजाओं ने भी उस में सोने तथा चांदी मढ़वाये सब से अंत में सउदी अरब के राजा शाह सऊद ने इसे खालिस चांदी से मढ़वाया.
इस्लामी ईतिहास में हजरे अस्वद से एक नेहायत ही दुखद घटना जुडी हुई है, अबू ताहिर क़र्मोती (जिस का सम्बन्ध क्रामेता नामी शीई धर्म से था ) नाम के एक आक्रमणकारी ने सन ३१७ हिजरी में मक्का पर आक्रमण करके मक्का की पवित्रता को भंग कर दिया एवं काबा की बेहुरमती की एवं हाजियों को मार कर ज़मज़म के कुंवे में डाल दिया,तथा ज़मज़म के कुब्बे को गिरा दिया एवं काबा की दिवार को गिरा दिया तथा काबा की चादर को फाड़ कर अपने साथिओं में बाँट दिया एवं हजरे अस्वद को निकाल कर अपने साथ ले गया . बाईस वर्ष बाद सन 339 हिजरी में फिर दोबारा उसको उसके स्थान पर लौटा दिया गया
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http://abdulaleemsalafi.blogspot.com/2010/08/blog-post_7741.html
every thing written at quran is found at other religious book and scientifically it is possible that your paigambar can copy and past it to quran becouse it is unbelievable that god tell hole story to paigambar
sanatan dharm kabhi bhi khatm na hone bala dharm hai, muslimo ne jehad ka naam lekar jabran dharm change karbaya, chenge na karne par hatya kar di sanatan dharm (hindu) dharm k nast karne ki poori kshish ki lekin kar na sake koshish aaj bhi jaari hai, lekin jis din sanatan (hindu)dharm ne soch liya ki .... tab muslim jaroor nahi bachege. upar ek kament me likha hai ki ek din sabhi log islam dharm apnayege tab pralay ayegi dekha aap logo ne matlab bhagban ne is dharm ko pratibandhit kar rakha hai isko koi bhi nahi apnayega or to or islam jis rah par ja raha hai baha ek din islamik log bhi islam chod doosara dharm apna lege .
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