डूबते हुए सूरज ने कहा- 'मेरे बाद इस संसार में मार्ग कौन दिखलायेगा? कोई है जो अंधेरों से लड़ने का साहस रखता हो?' और फिर एक टिमटिमाता हुआ दीया आगे बढ़ कर बोला -- 'मैं सीमा भर कोशिश करूँगा!' - सलीम खान, लखनऊ/पीलीभीत, उत्तर प्रदेश Email: swachchhsandesh@gmail.com

फ़िरदौस जी, आप हिन्दू धर्म अपना लीजिये; हम आपके साथ है!!!

Written By सलीम ख़ान on शनिवार, 10 अप्रैल 2010 | Saturday, April 10, 2010


बहन फ़िरदौस, मैं आपका छोटा भाई सलीम ख़ान ! आज आपकी यह पोस्ट पढ़ी जिसमें इस्लाम धर्म छोड़ कर हिन्दू धर्म अपनाने के लिएय परम आर्य जी द्वारा आपको सलाह दिए जाने पर आपका जवाब आया था. जवाब सुन कर ख़ुशी हुई और यह 'कोट' भी पसंद आया "न दैन्यम न पलायनम". 


लेकिन हमें एक बात यह समझ नहीं आई 

आख़िर 

वे कट्टरपंथी कौन हैं जिनसे आप घबराने की बात कर रही हैं? आख़िर किनसे कौम की बहनों को ख़तरा है? आपने यह बात भी बहुत खूब कही कि "हम पहले इंसान हैं फिर मुसलमान" चलिए यह भी मान लिया. आपने आगे लिखा कि आप मज़हब को मानने के मुकाबले रूहानियत (जो क़ल्ब अर्थात ह्रदय को अच्छा लगे) को तरजीह देतीं हैं. बुरा मत मानियेगा बहन फ़िरदौस आगे आप गच्चा ख़ा गई और जोश में होश खो बैठी; आपने कहा कि क्या फर्क पड़ता है कि आप मंदिर में किसी मूर्ति के सामने जा कर पूजा करें, उसकी इबादत करें, उस मूर्ति को कि ईश्वर समझें.... !!!??? बहन फ़िरदौस तब आप बेशक खुद को, आपने क़ल्ब को खुश रख लीजिये लेकिन इस बिनाह पर आप इंसान तो हैं, लेकिन मुसलमान नहीं... (इंसान तो एक चोर भी है, वह आपने बच्चे के पेट को पालने के लिए चोरी करता है.) जहा तक किसी यज्ञ में शामिल होकर उसके क्रिया कलापों को करने का सवाल है, जहाँ तक किसी माता के गीत गाने का सवाल है तो मैं आपको बताता चलूँ कि बचपन में मैं भी मंदिर में जाकर प्रसाद तैयार करवाता था, पंजीरी बनाता था, जन्माष्टमी के दिन घंटा मेरे ही हांथों में होता था, स्कूल के ज़माने में यज्ञ में शामिल होता था, प्रसाद भी खाता था, हत्ता कि उसमें गाय का पेशाब मिला होता था...फिर भी !!! मालूम है क्यूँ??? क्यूंकि मुझे मालूम ही नहीं था (बल्कि मुझे बताया ही नहीं गया) कि यह सब ग़ैर-इस्लामिक क्रिया-कलाप हैं. आज आपसे अगर मैं कहूँ कि यह है प्रसाद फलां भगवान् का और इसमें गाय का पेशाब भी मिला है तो क्या आप उसे ग्रहण करेंगी??? जहाँ तक मैं आपको जानता हूँ हरगिज़ नहीं करेंगी! 



आगे मैं आपको बता दूं कि दुनियां में हिन्दू धर्म नाम का कोई धर्म है ही नहीं. और जो खुद को हिन्दू कहते हैं उनकी किसी भी धार्मिक किताब में आप हिन्दू शब्द दिखा दीजिये !!! इसके मुताल्लिक मेरा यह लेख पढ़ें

चलिए मान लिया कि कौम की बहनों के लिए आप सोच-सोच कर मरी जा रही है, आप उनके लिए कुछ करना चाहती हैं वगैरह वगैरह !! लेकिन आप इस्लामिक अक़ीदे में क्यूँ आप तसलीमा नसरीन या सलमान रश्दी का लेप लगा रहीं हैं, यह तो निहायत ही गलत होगा. हो सकता है कि आप खुद को कंट्रोवर्शियल बनाये रखने के लिए यह सब लिख रहीं हों... मगर यह भी अल्लाह के नजदीक बेहद संगीन गुनाह है. आप भले ही किसी से भी मुतास्सिर क्यूँ न हों, आप तब तक मुसलमान नहीं हो सकती जब तक आप कुर-आन में लिखीं उन बेसिक बातों को नीयत सहित अमल न करें... जैसे अल्लाह एक है और वही पूज्य है एवं हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) उसके आख़िर पैग़म्बर हैं. अगर आप वाकई मानती है कि अल्लाह एक है तो फिर आपने ये क्यूँ कहा कि क्या फर्क पड़ता है कि आप मंदिर में किसी मूर्ति के सामने जा कर पूजा करें, उसकी इबादत करें, उस मूर्ति को कि ईश्वर समझें.... !!!??? आपने ऐसा क्यूँ कहा आप इसका जवाब दीजिये??? 

हंसी आ रही है आपकी सोच पर कि आपने जेहाद का अर्थ 'धर्म युद्ध' लिखा है. चैलेन्ज है कि इसका अर्थ अगर कहीं भी धर्म युद्ध हो तो दिखाईये??? इसके मुताल्लिक मेरा यह लेख पढ़े.

हो सकता है कि आपका कि बोर्ड इसका जवाब न लिख सके मगर मुझे यह मालूम है कि आपका क़ल्ब इस वक़्त ज़ार ज़ार रो रहा होगा कि हाय यह मैंने क्या कह दिया... मैंने अल्लाह पर अकीदा क्यूँ हटा लिया... नहीं ईंईंईंईंईंईं.... काश यह आसमान फट जाए यह ज़मीन खिसक जाये.. मैं एक मुसलमान हूँ और ऐसा कैसे कह दिया....

मुझे याद है आप बीते वक़्त में महफूज़ अली की तरह ही हमारी अन्जुमन में शामिल थीं... आपका हमारी अन्जुमन में शामिल होना और उसे छोड़ देना, ज़रूर कहीं न कहीं कुछ बात थी. मैं उस मुद्दे पर नहीं जाना चाहता. बस इस पर आप आपने दिल में झाँक कर देखिये और सोचिये कि हक़ीक़त में क्या सच है??? मायने यह नहीं कि सलीम क्या कहता है, क्या नहीं कहता है; मायने यह रखता है कि सच्चाई क्या है और सच्चाई के लिए आपको कुर-आन का मुताला फिर से ढंग से करिए !!! हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) की जीवनी ने हमें क्या सन्देश दिया है, यह जानिए....!!! प्लीज़ अतिवादी वे नहीं जिन्हें आप इंगित कर रहीं है बल्कि अतिवादी आप होती जा रही है... रुकिए... प्लीज़ रुकिए कहीं ऐसा न हो देर हो जाये...
वक़्त की कमीं के चलते मैं फिर इतना ही कहना चाहता हूँ कि रुकिए... प्लीज़ रुकिए कहीं ऐसा न हो देर हो जाये...

34 पाठकों ने अपने विचार व्यक्त किये:

मिहिरभोज ने कहा…

सलीम साहब आप तो बच्चे ही अच्छे थे......जो पंजीरी खाते,या गौमूत्र पीकर आप को कभी बुरा नहीं लगा न कि जन्माष्टमी पर मंदिर जाकर.....फिर क्या हुआ आपके साथ....खैर जो भी हुआ बहुत गलत हुआ कि आप इंसान से कठमुल्ला बन गये.... बहन फिरदौस जैसी हैं उन्हें वैसी ही क्यों नहीं रहने देते आप.....इंसान ....जो कि मुसलमान होने से ज्यादा जरूरी है......फिरदौस जी की इस पोस्ट पर देखिये किसी ने भी कहा कि हिंदु बन जाईये....सब ने भत्सर्ना की उस व्यक्ति की जिसने ऐसै विचार व्यक्त किये.....आप मुसलमान हैं या हिंदु क्या फर्क पङता हैं....पहले इंसान तो बनिये...आप भी बाहर निकल आईये .....उस कोठरी से जिसमें नीम अंधेरा ही अंधेरा है.....देखिये बाहर बहुत रोशनी है

Arvind Mishra ने कहा…

मुझे भी लगता है हम क्यूं हिन्दू मुसलमान का रट लगाये हुए हैं हम महज एक इंसान बन कर नहीं रह सकते?

samiuddeenreporter ने कहा…

बहूत ख़ूब. सरकश लोगों के लिए दारोगा का काम कर रहे हो तुम.

EJAZ AHMAD IDREESI ने कहा…

सलीम भाई वैसे तो मैंने धार्मिक विद्वेष वाली बातों को गौर नहीं करता फिर भी मुझे लगता है फ़िरदौस ख़ान की आड़ में कोई और है जो साजिश रच रहा है.

Khursheed ने कहा…

असल में होता यूँ है कि आज के ज़माने में कहना सभी चाहते हैं मगर सुनने का माद्दा नहीं रखते

आज के ज़माने में जो औरते पुरुष से कथित बराबरी की बातें करती हैं वह देश आज एड्स और न जाने क्या क्या बिमारियों से सड़ रहे हैं. यकीनन हमें इस मुताल्लिक़ सत्य सनातन धर्म का और इस्लाम का समग्र रूप से गहन अध्ययन कर उस पर अमल करना चाहिए और पश्चिम के अन्धानुकरण को बिलकुल ही त्याग देना चाहिए

सलीम ख़ान ने कहा…

@मिहिर भोज, बचपन में मैंने जो कुछ किया वह अज्ञानता अथवा आस-पास के माहौलानुसार किया था. उस वक़्त मुझे यह नहीं पता था. उस अल्लाह के अलावा किसी और के नाम का भोज खाना भी हमारे लिए हराम है. और मैं बता दूं मैं न मुल्ला हूँ और कठमुल्ला ! मैं एक इस्लाम का तालिब (छात्र) हूँ. सवाल आपसे यह नीम अँधेरा से आपका क्या अभिप्राय है...

सलीम ख़ान ने कहा…

...और मैं किसी भी चीज़ की अति से परहेज़ रखता हूँ यह सभी जानते हैं, मकसद मेरा है सुधार का... अपना सुधार और हम सबका सुधार और बस !!!

सलीम ख़ान ने कहा…

अरविन्द मिश्रा जी आप ने यहाँ पधारा; बहुत बहुत शुक्रिया... मैं स्वयं यही चाहता हूँ और सन्देश देना चाहता कि हिन्दू (सत्य सनातन)-मुसलमान (इस्लाम) की रट से बेहतर है इसकी समानता की तरफ ध्यान देना चाहिए. यही वजह है कि मैंने ब्लॉग का स्लोगन ही रखा है "इन्सान का इन्सान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा..."

कुर-आन की एक आयत भी है ::: और उस बात की तरफ जो हममें और तुममें यकसां (एक जैसी) हो और उनमें एक है ईश्वर का एक होना.

सलीम ख़ान ने कहा…

@EJAZ AHMAD IDREESI साजिश कहीं नहीं है; बस हमारी बहन का इस्लाह कर रहा हूँ !!! आप अल्लाह से दुआ करिए कि बहन फ़िरदौस को तौफ़ीक़ अता फ़रमाये!!!

बेनामी ने कहा…

sathiyaye gaye ho ka saleem fir se baura gaye ho ka.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

सलीम साहेब पहले तो आप खुद एक अच्छा मुसलमान बन कर के दिखाइए उसके बाद अपने उन सारे भाई बंधू लोगो को सही इस्लाम की शिक्षा दीजिये , जिनके अन्दर सिर्फ कुरान -कुरान भरा पड़ा है। अरे कंही से तो इन्सान भी नज़र आवो । कुरान और मोहम्मद साहेब से पहले भी दुनिया थी और शायद आज से ज्यादा ही खुबसूरत थी। कुरान तो सिर्फ अरबियन समाज के इर्द गिर्द ही घुमती है। लेकिन कुछ तो क़द्र करो अपनी मातावो और अपनी बहनों का। कुछ तो क़द्र करो अपने देश के संविधान का। कुछ तो क़द्र करो अपने पूर्वजो का ।

तुम्हे गाय के मूत्र से इतनी दिक्कत होती है तो क्यों खाते हो आयुर्वेदिक और इंग्लिश दवाइयों को। क्या पता किसी और जानवर का मूत्र या हड्डी मिली हो किसी दवा मैं, और क्या पता वो जानवर तुम्हारे लिए हराम हो। गाय का मूत्र मिला प्रसाद खाने मैं आपको इतनी तकलीफ हो रही है , मगर जानवरों के मल-मूत्र की थैली मसाले के साथ पका कर के खाने मैं तो बड़ा ही आनंद आता होगा।

सलीम ख़ान ने कहा…

आप को मैं बता दूं कि कुर-आन सिर्फ अरबों के लिए ही नहीं, सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं... बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है. यह एक वाहिद ऐसी किताब है जिसके बारे में अल्लाह खुद गवाही देता है कि आखिरी किताब है और इसके बाद कोई हिदायत करने नहीं आयेगा.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

बस येही आपकी सोच आपको कट्टर बनाती है और आगे चल करके जेहाद का रूप ले लेती है , जिसे दुनिया आज कल आंतकवाद के नाम से जानती है।

ये टिप्पड़ी विस्तार रूप मैं मेरे ब्लॉग पर भी है, पढ़े www.taarkeshwargiri.blogspot.com

प्रवीण शाह ने कहा…

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मित्र सलीम,

आस्था, विश्वास और धर्म नितांत वैयक्तिक मामले हैं... कोई किसे मानता है और क्यों मानता है इस बात पर सवाल उठाना ठीक नहीं... अच्छा हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध, यहूदी, पारसी आदि आदि होने से ज्यादा जरूरी है एक बेहतर इन्सान होना... आप एक अच्छा इन्सान बनें तो आपकी प्राथमिकतायें स्वत: ही सही हो जायेंगी।

boletobindas ने कहा…

सलीम कुपया करके हिंदु औऱ सनातम धर्म को अलग-अलग न करो आज के दौर में...सनातन का मतलब होता है सदैव नया,... आर्यों को हिंदु अरब के लोगो ने कहा था, मालुम होगा तुम्हें...तब कोई इस्लाम नहीं था हिन्दुसतान में...सो अब का समाज अपने को हिदु कहता है तो कोई समस्या उसे नहीं, पर जाने क्यों तुम जैसे लोगो को क्यों है...तो आज का हिंदु औऱ पहले का सनातन धर्मी को अलग अलग बता कर लोगो को बरगलाऔ मत...कुरान के पहले भारत में वेद थे, औऱ आज भी अंतिम सच वेद के आगे नहीं है..चो कर्मकांड का विरोध करते हैं उन्हें हम तुम्हारी तरह अधर्मी नहीं कहते....क्योंकि कोई भी पंडित वेद के उपर नही है....इसिलए हमारे यहां हर तरह की शादी वैध है....औऱ महिलाओं को बुर्का पहनाने की प्रथा अरब से आई है क्योंकी कामुक अरब जंगली लोगो की वासना से भारत की महिलाएं बचना चाहती थीं... भारत मे कभी औरतखोर इंसान को सभ्य नहीं माना गया है..... अरब के जंगली लोगो की नजर से औऱतों को बचाने के लिए ही मोहम्मद पैंगबर ने बुर्का अनिवार्य किया था...उसे भारत बर न थोपो....धर्म एक रहता है औऱ वो है प्यार का,..वासना का नहीं..भौगोलिक स्थितियों के कारण कुछ परिवर्तन आते हैं जैसे बुर्का अरब के जंगली लोगो के सामने अनिवार्य है न कि भारत के शिक्षितो औऱ संत लोगो के सामने..अब तुम संत के नाम पर आजके संतो का उदाहरण न देने लगना....सलीम तुम चाह कर भी कटरपन छो़ड़ नही पा रहे हो....किसी मंदिर की घंटी बजाने से धर्म भ्र्ष्य नहीं होता ... तुम सही में बचपन मे ही ठीक थे...औऱ देश में लोगो ने किसी का विरोध नही किया ....17 करोड़ से ज्यादा मुसलमान भारतीय हिंदु की संतान ही हैं ..... तुम चाह कर भी सामान्य इंसान नही हो सकते.....तसलीमा नसरीन भारत में शरणार्थी थी, वो भी औरत ..शरण लेने वोले दुशमन को भी भारत शरण देता है. पर तुम्हारे जैसे लोगो ने इस सर्वोच्चय आदर्श पर भी भी कलंक लगा दिया है... जरा सा भी विरोध तुम से बरदाशत नहीं होता..... भारत के देशभक्त मुसलमानों को बरगलाओ मत...

Atul Mishra ने कहा…

Kavi Neeraj Ji Ne Sahi Kaha Hai, Saleem Bhai--
Ek Mazhab Yahaan, Aisa Bhi Banaaya Jaaye !
Jismein Insaan Ko Insaan Banaaya Jaaye !!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

इंसान को बोलने से पहले सोचना चाहिये कि माता की कथा बुल्ले बुल्लेशाह जी ने कब पढ़ी है ? जब नानक जी ने नहीं पढ़ी , कबीर ने ना पढ़ी , द्‍यानंद जी ने न पढ़ी तो भाई हम क्यूँ पढ़ें ?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ giri ji , कमज़ोर ज़हन के लोग अक्सर महॉल के दबाव में आकर बहक जाते हैं . बहन फिरदौस को सही बात बता कर सलीम ख़ान ने खुद को अच्छा मुसलमान ही तो साबित किया है .

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

Rank-3 ब्‍लागर होने के बाद का आपका यह अन्‍दाज मुझे बेहद पसन्‍द आ रहा है वैसे सब जाने मेरा समर्थन आपके हर अन्‍दाज को रहा है, आज भी आपने अपने विचार बहुत अच्‍छे अन्‍दाज में रखे हैं, इस बहाने आपके बचपन से भी वाकफियत हो गयी, मुझे लगता है हम सब का बचपन ऐसे ही अज्ञानता में गुजरता है , बस फर्क इतना है किसी की यह अज्ञानता जवानी तक चली आती है, अल्‍लाह हमरी इस खता को माफ करे , आमीन

safat alam taimi ने कहा…

सलीम खान भाई ! आपने बहन क़ी रहनुमाई क़ी, अल्लाह आपको अच्छा बदला दे...दिल क़ी बात कहूँ क़ी इस मसले ने मेरी रातों क़ी नींद ख़तम कर दी थी ... मै हफ़्तों से सोच रहा था कि बहन फिरदौस को मेल करूं, कुछ मसाएल में बहन जी को इख्तिलाफ है तो इस से कोई फर्क नहीं,,,, इस्लाम ने शरीअत में एख्तेलाफ कि गुंजाईश रखी है, लेकिन अकीदे में कोई ताल मेल नहीं है.... बहन फिरदौस से हम भी जुजारिश करते हैं कि मसले को संजीदगी से सोचें... किसी के बहकावे में न आयें ... आपने ६०० चीनियों के इस्लाम स्वीकार करने क़ी सुचना भी अपने ब्लॉग पर डाली है, हमारी अंजुमन में आकर टिपण्णी भी क़ी है... हमें आप से उमीद है क़ी आप अपनी बात पर गौर करेंगी ... अल्लाह हम सब को हिदायत दे .... आमीन

safat alam taimi ने कहा…

بھائی سلیم معاف کیجئے گا اردو میںلکھ رہا ہوں ۔ناچیز نے اپنے ماہنامہ مصباح کے اپریل کے شمارے میںمولانا ندیم الواجدی کا ایک مضمون شائع کیا ہے، اس مناسبت سے میں اسے ہو بہو پیش کردینا مناسبت سمجھتاہوں ۔
عصرحاضرمیں امت مسلمہ کا المیہ ہے کہ اس کا ایک طبقہ روشن خیالی اوررواداری کے نام پر شریعت اسلامیہ کو تمسخر کا نشانہ بنارہاہے،اسلام کے بنیادی عقائد سے منہ موڑ کر فکری ارتدار کا شکار ہو رہا ہے۔اوریہ دراصل عالم اسلام میںوحدت ادیان اور فکری ارتداد کے لیے کام کررہی اسلام دشمن تنظیموں کی کوششوںکا شاخسانہ ہے ۔افسوس کہ میڈیامیں اسلام کی ترجمانی کرنے والوںکی اکثریت اسی نظریہ کی حامل ہے ۔ مفکراسلام مولانا ابوالحسن علی ندویؒ کی کتاب ردة ولاا ¿بابکر لھا ”امت میں ارتداد عام ہے تاہم اس کی سرکوبی کے لیے ابوبکر ؓنہ رہے “ اس دور کی ہوبہو عکاسی کرتی ہے ۔ اس پرطرہ یہ کہ یہ جماعت اسلام کی تعلیمات کو اپنانے اور اسے پوری طرح عملی زندگی میں جگہ دینے کو مذہبی کٹرپن کانام دیتی ہے۔زیرنظرتحریرمیںاسی تجددپسندذہنیت کاپوسٹ مارٹم کیا گیا ہے
(ایڈیٹر)

safat alam taimi ने कहा…

یہ مضمون مندرجہ ذیل بلوگ پتے پر پڑھا جا سکتا ہے
http://misbahurduonline.blogspot.com/

सलीम ख़ान ने कहा…

बहन फ़िरदौस का इंतज़ार है

EJAZ AHMAD IDREESI ने कहा…

सलीम भाई आप एक महान ब्लॉगर है और मैं इधर बैठ कर यह दावा करने में बिलकुल भी नहीं हिचकुंगा की "पूरे ब्लॉग जगत में एक सिर्फ आप ही मर्द हैं"

डॉ. दलसिंगार यादव ने कहा…

धर्म जैसी कोई चीज़ होती तो मैं भी बाज़ार से खरीद लाता और अपने घर में सजा लेता। मुझे तो मेरे गुरुजनों ने सिखाया था कि धर्म एक संस्कार है जीने की राह है, सच्चे मन से लोकहित और मानवीय व्यवहार करना है। अब यह विवाद संकुचित बुद्धिवादिता लगती है। ताराचंद पाल के शब्दों में -

हिंदू मिलते हैं, मुसलमान मिलते हैं,
सिक्ख मिलते हैं, क्रिस्तान मिलते हैं,
वह गली, मोहल्ला या सड़क नहीं मिलती,
जहाँ खुद्दार इंसान मिलते हैं।

प्यार बाँटिए, धर्म के नाम पर इंसानियत को न बाँटिए। बुद्धि विलासिता के लिए चर्चा न करें।

Sujeet Singh ने कहा…

सलीम ने तो सिद्ध कर दिया कि कुरान कभी भी एक इंसान नहीं बनाने के आदेश दिया है और ना ही दे सकता है सिर्फ और सिर्फ कट्टरता और इस्लामीकरण को ही बढ़ावा देने के लिए है |
सलीम अपने आप को सच्चा इंसान कहता है | क्या यही सच्चा इंसान होता है जो दूसरों के धार्मिक जगहों में सम्मिलित ना हो|दूसरों के धर्म को दूसरी निगाहों से देखे |
क्या हो जायेगा यदि फिरदौस खान मंदिर में गीत गाएंगी या मंदिर में भगवान कि पूजा करेंगी ?
हां हां उनका धर्म बदल जायेगा ?
जीवन की दिशा बदल जायेगी ?
आखिर क्या हो जायेगा ?

लात मार दो ऐसे धर्मो को जो एक दूसरे को मिलने से रोकता है , दूसरों के खुशुइयो में सम्मिलित होने से रोकता है, अपने आगे किसी कि सम्मान नहीं करना जानता है |

बहुत धर्म की बड़ी बड़ी बाते करते हो सलीम, और तुम फिरदौस खान जैसी लोग को शिक्षा दे रहे हो | जो भाई चारा के लिए समर्पित है|
तुम यही चाहते हो भी कि फिरदौस खान वही बात लिखे जो तुम जैसे कठमुल्ले लिखते है |

रही बात हिंदू कि तो - सभी जानते है कि हिंदू को किसी ने नहीं बनाया है, हिंदू धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है | हिंदू सिर्फ और सिर्फ एक संस्कृति है जहाँ पुरे विश्व के लोगो को भाई चारे के साथ रहना सिखाया जाता है | अपने आप को किसी भी रूप में जहाँ जाता है ढल जाता है | कट्टर नहीं होता है, ( जैसा कि तुम फिरदौस खान पर थोप रहे हो ) साधारण होता है , सच्चा होता है |
सोचो सलीम ! कि कोई हिंदू जब किसी मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा... के आगे से गुजरात है तो देखोगे कि उसका सिर क्षद्धा से झुक जाता है |क्यों ? क्योकि हिंदू कट्टर नहीं होता है | इसा महीस में, अल्लाह में, या किसी और धर्म के भगवान में कोई फर्क नहीं समझता है जनता है कि सब जगह भगवान है |
क्या तुम ऐसा कर सकते हो? नहीं कर सकते हो | क्यों कि तुम मुसलमान नहीं रह जाओगे ऐसा करके | कुरान आदेश नहीं देता है तुम्हे ऐसा करने के लिए | मानवता भाईचारा से बढाकर मुसलमानों के लिए ( फिरदौस खान जैसे देवियों को छोड़ कर )सिर्फ कुरान है |
काश हिंदू भी तुम लोगो कि तरह कट्टर होता तो कोई हिंदू किसी मजार पर चादर चढाने नहीं जाता | कुछ सीखो सलीम फिरदौस खान से , आधुनिक दुनिया में जी रहे हो और सोच औरन्गेज कि है जनता हू तुम नहीं बदलोगे जब तक कि कुरान को ना बदला जाय |

हिंदू धर्म में हिंदू कि बात है तो तुमहरा दिमाग हज करने गया है क्या कि " हिंदू धर्म कि सारी किताबे इस्लाम के पैदा होने से कितने सदियों पहले ही लिख दी गयी थी | उस समय कोई धर्म नहीं था,
तुम्हारी सोच पर तरस आती है सलीम कि तुम फिरदौस खान पर जबरदस्ती दबाव् बना रहे हो| हमें नाज़ है फिरदौस खान पर |जो इस्लाम के कट्टरता को पहचानती है और उसका मुकाबला भी कर रही है
जब फिरदौस खान इंसान है तो मुसलमान कहा है| क्यों कि मुसलमान इंसान हो ही नहीं सकता है | कुरान उसे इंसान होने का कोई गुण सिखाया ही नहीं है | वाह सलीम वाह ! अगर फिरदौस खान मंदिर में जाती है तो मुसलमान नही रह जाती है | लानत है ऐसे इस्लाम पर |


तुम्हारी सोच कि परते खुल रही है, तुम अपने आप को कभी भी इंसानों का दोस्त मत कहना |हाँ तुम मुस्लिमो के दोस्त हो सकते हो मगर गैर मुस्लिमो के नहीं|
गलती तुम्हारी नहीं है , गलती तुम्हारे कुरान कि है जिसे पढ़ कर ही एसी बाते कर रहे हो, और उसी कुरान को पढ़ कर आतंकवादी बनाते है



इसे डाउनलोड करो सलीम पढ़ो | जनता हू इसे भी तुम गलत ही कहोगे | क्यों कि कट्टरता जहा होता है वहाँ दूसरे कि बाते नहीं समझ में आती है |

http://www.mediafire.com/?38ct5ou3bfkv9t2

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

इस ब्लॉग पर पोस्ट पढ़ कर बड़ा मज़ा आता है और टिप्पणियाँ पढ़ कर तो और भी ज्यादा ...
लगे रहो कौम के उत्थान में ...

एम सिंह ने कहा…

अच्‍छी चर्चा

एम सिंह ने कहा…

मेरे ब्‍लॉग पर आएं... आपके लिए कुछ है.

mydunali.blogspot.com

Tausif Hindustani ने कहा…

इस्लाम में इख्तिलाफ का कोई स्थान नहीं , जब दलील मिल जाये तो तब भी इख्तिलाफ करने वाला गलत है, जैसा की अल्लाह ने कुरान में फरमाया है , की अल्लाह की रस्सी ( कुरान व सुन्नत ) को मजबूती से पकड़ लो और आपस में इख्तिलाफ न करो,
एक इन्सान तब तक अच्छा इंसान नहीं बन सकता जब तक वो पक्का मुसलमान न हो , वरना जैसा की सलीम साहब ने फ़रमाया . की इंसान तो चोर, डाकू , बलात्कारी, हत्यारे सब होते हैं , और एक अच्छा इंसान बनने के लिए क्या पैमाने है ?

अजय सिंह ने कहा…

तौसिफ तुमन तो सलीम से भी दो कदम आगे बढ़ गए ?

हां..हा.हां पहले मुसलमान बनो फिर इंसान ?
यानी इंसानियत से भी ऊचा मुसलमान है ? वाह क्या तर्क दिया है ? पुरे विश्व मव मुसलमान ही आतंकवादी है तो क्या ये सब इंसानियत के जीते जागते रूप है ?

तुम सब इस्लामिक अंधे हो ? जिसका अंत सिर्फ और सिर्फ गर्क ही होता है | तुम सब कभी इंसान नही बन सकते ? क्यों कि मुसलमान कभी इंसान नही हो सकता है |

Dr.sunil kumar ने कहा…

कुछ बुद्धिहीन लिखते है कि हिंदू शब्द की उत्पत्ति

१७ वीं शताब्दी में हुई है. उदहारण के रूप में नेहरू कि डिस्कवरी ऑफ़

इंडिया का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. नेहरू की वह पुस्तक नेहरू की तरह

झूंठ का पुलिंदा है. नेहरू अपने आप में कितना झूठा व हिंदू विरोधी था यह

सच आज सबके सामने खुलता जा रहा है.

हिंदू शब्द भारतीय विद्दवानो के

अनुसार कम से कम ४००० वर्ष पुराना है. शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी

शताब्दी में रचित है, में मन्त्र है.............

"हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:" (अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है.)

इसी प्रकार अदभुत कोष में मन्त्र आता है ......

"हिंदू:

हिन्दुश्च प्रसिद्धौ दुशतानाम च विघर्षने". (अर्थात हिंदू और हिंदु दोनों

शब्द दुष्टों को नष्ट करने वाले अर्थ में प्रसिद्द है.)

वृद्ध स्म्रति (छठी शताब्दी)में मन्त्र है,...........................

"हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्पर:

वेद्.........हिंदु मुख शब्द भाक्। "

अर्थात जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर चलने वाला, हिंसा से दुख मानने वाला है, वह हिंदु है।

ब्रहस्पति आगम (समय ज्ञात नही) में श्लोक है,................................

"हिमालय समारभ्य यवाद इंदु सरोवं, तं देव निर्वितं देशम हिंदुस्थानम प्रच्क्षेत."

(अर्थात हिमालय पर्वत से लेकर इंदु(हिंद) महासागर तक देव पुरुषों द्बारा निर्मित इस छेत्र को हिन्दुस्थान कहते है.)

पारसी

समाज के एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है कि, "अक्नुम बिरह्मने

व्यास नाम आज हिंद आमद बस दाना कि काल चुना नस्त" (अर्थात व्यास नमक एक

ब्र्हामन हिंद से आया जिसके बराबर कोई अक्लमंद नही था.)

इस्लाम के

पैगेम्बर मोहम्मद साहब से भी १७०० वर्ष पुर्व लबि बिन अख्ताब बिना तुर्फा

नाम के एक कवि अरब में पैदा हुए, उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में लिखा

है,............................

"अया मुबार्केल अरज यू शैये नोहा मिलन हिन्दे.

व अरादाक्ल्लाह मन्योंज्जेल जिकर्तुं..

(अर्थात हे हिंद कि पुन्य भूमि! तू धन्य है,क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना है.)

१० वीं शताब्दी के महाकवि वेन .....अटल नगर अजमेर,अटल हिंदव अस्थानं.

महाकवि चन्द्र बरदाई....................जब हिंदू दल जोर छुए छूती मेरे धार भ्रम.

जैसे

हजारो तथ्य चीख-चीख कर कहते है की हिंदू शब्द हजारों-हजारों वर्ष पुराना

है. इन हजारों तथ्यों के अलावा भी लाखों तथ्य इस्लाम के लूटेरों ने

तक्षशिला व नालंदा जैसे विश्व -विद्यालयों को नष्ट करके समाप्त कर दिए.

इसलिए

मेरा आप सब से अनुरोध है कि तुम किसी अध्यनहीन व बुद्धिहीन व्यक्ति की

ग़लत जानकारी को सच न माने. हिंदू धर्म की बुराई करो और अपने को हिंदू

कहो, ऐसा करने से कोई हिंदू नही बन जाता. जो लोग जवाहर लाल नेहरु को

इतिहासकार मानते हैं, उनकी बुद्धि पर तरस आता है. वह प्रसिद्ध, चतुर

राजनेता थे जिन्होंने गाँधी पर जादू किया खादी पहनी और सभी सुख भोगे.

JAI HINDU RASTH ने कहा…

भाई सलीम
एसा कोई जहान मिले चेहरो पे मुस्कान मिले
काश,,, मिले मन्दिर मे अल्लाह
मस्जिद मे भगवान मिले


भाई सलीम हमारे तो यही विचार है
ओर हर हिन्दुस्तानी चाहे कोई धर्म का हो उसका भी यही विचार है
तभी तो ईद मोहरम मे हिन्दु सामिल होते है ओर होली दिपावली पर मुस्लमान

narendra ने कहा…

JAI HINDU RASTH bhai kya aap inke id moharram mein jakar gau khane ka irada rakhte hoo

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