डूबते हुए सूरज ने कहा- 'मेरे बाद इस संसार में मार्ग कौन दिखलायेगा? कोई है जो अंधेरों से लड़ने का साहस रखता हो?' और फिर एक टिमटिमाता हुआ दीया आगे बढ़ कर बोला -- 'मैं सीमा भर कोशिश करूँगा!' - सलीम खान, लखनऊ/पीलीभीत, उत्तर प्रदेश Email: swachchhsandesh@gmail.com

बकरा-ईद में मुसलमान करोड़ों निर्दोष जानवरों की हत्या क्यूँ करते है?

Written By सलीम ख़ान on सोमवार, 8 नवम्बर 2010 | Monday, November 08, 2010

स्लाम धर्म में माँसाहार की रीति दयाभाव के प्रतिकूल है. पशुवध निर्दयता है. धर्म निर्दयता और हिंसा नहीं सिखाता है फ़िर इस्लाम निर्दयी क्यूँ है? इस्लाम निर्दयता की शिक्षा क्यूँ देता है? अल्लाह का नाम लेकर पशुवध करने से क्या यह कृत्य वैध हो जाता है, अच्छा बन जाता है? बकरा-ईद में मुसलमान लोग करोड़ों निर्दोष जानवरों की हत्या क्यूँ करते हैं? क्या मुसलमानों द्वारा किया गया यह कृत्य घोर निर्दयता नहीं है? क्या कोई मुसलमान यह साबित कर सकता है कि यह कृत्य उचित है?? अगर है तो वह सामने आये !!!


बकरा-ईद आने वाली है और इस मौक़े पर उपरोक्त-लिखित प्रश्न हर ग़ैर-मुस्लिम, हिन्दू अथवा बौधिस्ट एवम जैनी भाई के मष्तिष्क में, ह्रदय में उठेंगे/उठते होंगे, जिनका उत्तर उन्हें एक आम-मुसलमान नहीं दे पाता है और वह आम-मुसलमान या तो उस ग़ैर-मुस्लिम के उक्त तर्क को मान लेता अथवा छिप-छिपा कर मांस का सेवन करता है. यही नहीं वर्तमान में शाकाहार और मांसाहार एक शांत-आन्दोलन का रूप ले चुका है. लेकिन जहाँ तक मेरा मानना है तो इसके लिए मेरी निन्म बातें ही सब कुछ कह देतीं है कि
माँसाहार और शाकाहार किसी भी तरह से बहस का मुद्दा नहीं है. यह न तो किसी धर्म-विशेष की जागीर है और न ही मानने या मनवाने का विषय है. कुल मिलकर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह साग-सब्जियां आदि शाकाहारी चीज़ें और माँस भी ख़ा सकता है और उसे पचा सकता है. इससे न तो पर्यावरण-प्रेमियों को कुछ ऐतराज़ होना चाहिए और न ही इससे जानवरों के जानवराधिकार का ही हनन. अगर आपको माँस पसन्द हो तो माँस खाइए और अगर सब्जियां पसन्द है तो सब्जियां. आप सर्वाहारी जीव हैं.
अब बात ऊपर दिए गए ग़ैर-मुस्लिम, हिन्दू अथवा बौधिस्ट एवम जैनी भाई के सवाल के जवाब की, अव्वल तो इन सब सवाल से हर मुस्लिम को बचना चाहिए ::: जीव-हत्या अपने आप में न सही है और न ग़लत, न उचित है और न अनुचित, न निंदनीय है और न सराहनीय. इसका सही अथवा ग़लत होना इस बात पर निर्भर है कि इसका 'उद्देश्य' क्या है

मसलन अगर एक मेंढक को अनर्थ मार कर फेंक दिया जाए तो यह किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं होगा. यह हत्या, निर्दयता और पाप है लेकिन वहीँ चिकित्सा-विज्ञान के छात्रों शल्य-प्रशिक्षण देने के उनके द्वारा मेडिकल-कॉलेज में जो मेंढक की चीर-फाड़ की जाती है वह निरर्थक और व्यर्थ न होकर मनुष्य और मानव जाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा और न ही पाप बल्कि लाभदायक, वांछनीय और सराहनीय है.

और मेरा विश्वास है कि हत्या या हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही एक मापदंड है और यह मापदंड सम्पूर्ण मानव-समाज में प्राचीन काल से वर्तमान काल तक मान्य व प्रचलित रहा है. यही मानव-प्रकृति के अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तक़ाज़ों के अनुकूल भी !

हालाँकि जीव-हत्या, मांसाहार अथवा पशुबलि (जो कह लें) को विश्व के दो बड़े धर्मों इस्लाम और सनातन धर्म में पूर्ण-रूप से मान्यता प्राप्त है. सनातन धर्म के अनुसार देवताओं/ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि/माँसाहार की अनुमति और आदेश मौजूद हैं, आप स्वयं देखें::: मनुस्मृति 3/123, 3/268 5/23, 5/27, 5/28 ऋग्वेद 10/27/2, 10/28/3, अथर्ववेद 9/6/4/43/8 और इस्लाम में भी अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए क़ुरबानी का प्रावधान है. 

अतः सृष्टि के सृजनकर्ता ईश्वर/अल्लाह ने पृथ्वी की सारी जीवधारी व अजीवधारी वस्तुएं किसी न किसी पैमाने पर मनुष्य के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष उपभोग के लिए ही बनाईं हैं. प्रत्यक्ष उपभोग में मांसाहार भी आता है और मांसाहार को इस्लाम और ग़ैर-इस्लाम दोनों में सामान्य मान्यता प्राप्त है. कुछ व्यक्तिगत और सीमित सामुदायिक अपवाद है परन्तु वह नगण्य हैं.

जीवहत्या के सम्बन्ध में इस्लामी दृष्टिकोण को आसानी से समझा जाता है. हरेक जीवधारी (वनस्पति और पशु-पक्षी) को मनुष्य के उपभोग के लिए पैदा किया गया है. अगर यह बात समझ में न आये तो कुछ यूँ समझ लीजिये कि पेड़-पौधों, फलों और तरकारियों को काटना, तोड़ना (खाना और उपभोग करना) भी उसी प्रकार की जीवहत्या है जिस प्रकार से मछलियों, पक्षियों व पशुओं को खाने लिए उनकी हत्या करना 


विस्तृत रूप इस विषय पर मेरे अन्य लेख यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं, आपकी आलोचनाओं का स्वागत है.
-सलीम ख़ान 

44 पाठकों ने अपने विचार व्यक्त किये:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

TARKSANGAT POST HAI

Anonymous ने कहा…

Jeevan ka mulya mrityu ke pashchat pata chalta hai

udaharan swaroop

jinda murga Rs. 80/kg

Chikan Tandoori Rs. 380/kg

सलीम ख़ान ने कहा…

@सुरेन्द्र बहादुर सिंह " झंझट गोंडवी " jee ! Thanks !!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

जो आपत्ति करते हैं वे खुद चिता जलाते हैं और मुरदा जिस्म में मौजूद खरबोँ खरब जीवाणुओं को क्रूरतापूर्वक ज़िन्दा जला डालते हैं ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post.

KHURSHEED ने कहा…

ek behad umda post, ek baar fir mauqa bhi hai aur dastoor bhi

सलीम ख़ान ने कहा…

sahi kaha aapne , ANWAR BHAI !

समीउद्दीन नीलू ने कहा…

अगर यह बात समझ में न आये तो कुछ यूँ समझ लीजिये कि पेड़-पौधों, फलों और तरकारियों को काटना, तोड़ना (खाना और उपभोग करना) भी उसी प्रकार की जीवहत्या है जिस प्रकार से मछलियों, पक्षियों व पशुओं को खाने लिए उनकी हत्या करना !

waah kya baat kahi.

समीउद्दीन नीलू ने कहा…

अच्छी पोस्ट

EJAZ AHMAD IDREESI ने कहा…

माँसाहार और शाकाहार किसी भी तरह से बहस का मुद्दा नहीं है. यह न तो किसी धर्म-विशेष की जागीर है और न ही मानने या मनवाने का विषय है. कुल मिलकर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह साग-सब्जियां आदि शाकाहारी चीज़ें और माँस भी ख़ा सकता है और उसे पचा सकता है. इससे न तो पर्यावरण-प्रेमियों को कुछ ऐतराज़ होना चाहिए और न ही इससे जानवरों के जानवराधिकार का ही हनन. अगर आपको माँस पसन्द हो तो माँस खाइए और अगर सब्जियां पसन्द है तो सब्जियां. आप सर्वाहारी जीव हैं.

EJAZ AHMAD IDREESI ने कहा…

एक मेंढक को अनर्थ मार कर फेंक दिया जाए तो यह किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं होगा. यह हत्या, निर्दयता और पाप है लेकिन वहीँ चिकित्सा-विज्ञान के छात्रों शल्य-प्रशिक्षण देने के उनके द्वारा मेडिकल-कॉलेज में जो मेंढक की चीर-फाड़ की जाती है वह निरर्थक और व्यर्थ न होकर मनुष्य और मानव जाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा और न ही पाप बल्कि लाभदायक, वांछनीय और सराहनीय है.

EJAZ AHMAD IDREESI ने कहा…

सनातन धर्म के अनुसार देवताओं/ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि/माँसाहार की अनुमति और आदेश मौजूद हैं, आप स्वयं देखें::: मनुस्मृति 3/123, 3/268 5/23, 5/27, 5/28 ऋग्वेद 10/27/2, 10/28/3, अथर्ववेद 9/6/4/43/8

EJAZ AHMAD IDREESI ने कहा…

आप लगे रहिये जैसा की मैंने पहले भी कहा है की मैं आपके साथ हूँ
एक अति-उत्तम पोस्ट अच्छे मौक़े पर

vichaar ने कहा…

saleem ji apne bilkul logically baat kahi hai..badhaai

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

माँसाहार और शाकाहार किसी भी तरह से बहस का मुद्दा नहीं है इस पर बहस करना अपनी उर्जा बेवजह नष्ट करने समान है |

Dr. Ayaz Ahmad ने कहा…

माँसाहार और शाकाहार किसी भी तरह से बहस का मुद्दा नहीं है. यह न तो किसी धर्म-विशेष की जागीर है और न ही मानने या मनवाने का विषय है. कुल मिलकर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह साग-सब्जियां आदि शाकाहारी चीज़ें और माँस भी ख़ा सकता है और उसे पचा सकता है. इससे न तो पर्यावरण-प्रेमियों को कुछ ऐतराज़ होना चाहिए और न ही इससे जानवरों के जानवराधिकार का ही हनन. अगर आपको माँस पसन्द हो तो माँस खाइए और अगर सब्जियां पसन्द है तो सब्जियां. आप सर्वाहारी जीव हैं.

abhishek1502 ने कहा…

सलीम जी ये सब तो आप की हाँ में हाँ मिलायेंगे ही
मुद्दा ये नही की मांसाहार जायज है की नही क्यों की बहुत से हिन्दू मांसाहारी है .
क्या निरीह जानवर को तडपा तडपा कर मरना जायज है जिसे आप के यह हलाल करना कहते है .
है कोई मुस्लिम आलिम जो ये सिद्ध कर सके की ये मानवीय है या हम मान ले की मुस्लिम धर्म आततईयो का धर्म है

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

जीवाणुओं को चिता में क्रूरतापूर्वक ज़िन्दा जलाने वालों के बारे में क्या खयाल है ?

एस.एम.मासूम ने कहा…

जो काम अल्लाह की ख़ुशी के लिए किया जाए वोह जालिमाना नहीं हो सकता

Anonymous ने कहा…

chaliye hindu dharm ki manynataon par kichad ucchaalne ke bahane hi sahi aapne MANU-SMRITI & ATHRVVED padhe to sahi. !!!

apka koti koti dhanyavad.

Anonymous ने कहा…

bas yahi ek basic fark hai ISLAM me aur anya dharmo me ki islam ke rakhwale apne alava sabhi dharm ko galat sabit karne par tule rahte hain.
vishva ka koi dusra dharm ka anuyayi apna kimti waqt is tuchh chijo me jaaya nahi karta.
aap kisi dusre dharm ki burai likhne ki jagah apne dharm ki achhchaiyan likhiye yahan par vo jyadaya behtar hai.
varna jade khodne me kuch hath nahi aayega .

Anonymous ने कहा…

@masoom sahab.

aapke yahan kahte hain ki BACHCHE ALLAH KI DEN HAIN UNKI NIYAMAT HAIN.( dusre shabdon me HUM SAB USKI SANTAAN HAIN)

jara is bat ko tafseel se bataiye ki khuda tab kaise khush ho sakta hai jab usi khuda ke banaye hue janvaro (ya unke bachchon) ko nirdayta se kat deta hain.

agar vo PARAM-PITA HAI to apne bachcon ko kat-te hue dekh kaise khush ho sakta hai.

jahan tak mera apna sawaal hai mai shudh shakahari hoon aur egg bhi nahi khata kyonki usme bhi juvan hota hai.

Anonymous ने कहा…

kripya apne jawab me QURAN-E-PAK ka havala na den.(kyonki mai aisi bahas me kisi pavitra pustak ko beech me nahi lana chahta.

yahan par jawab manga ja raha hai sirf AAP uar MAI ke aadhar par.

Anonymous ने कहा…

Bhai mujhe to ek baat samajh me nahi aati hai ki jab in jeevo ko paida karne wale ko inki qurbaani per koi etaraz nahi hai to ye log is tarah ki thekedari kio karte hai. jo log insano ko sadio se janwaro se bhi buri tarah ghulam banae rakha. unse unke padhne likhne ka adhikar cheen kar gyan par apna ekadhikar jama kar logo ko bewaqoof banate rahe. wo aaj janwaro ki raksha or adhikar ki baat kis muh se karte hai. mai poochhta ho ahinsa ke thekedaro se ki agar wishva ki 6.8 arab abadi jab sirf shakahari ho jaenge to wo inke lie sabji kaha se laenge. tab janwaro ki tadad bhi badhegi use bhi sag-sanzi chahie or insan ko bhi. abhi to itni mahgai hai.tab sabzi to ambani or bil gets ke garo ki hi sobha ban kar rah jaegi or inhe zahrila ghas bhi nahi milega.
ye log kue ke medak hai. dar asal jis ishwar ne poori dharti banai hai wo jayada janta hai ki ise chalana kaise hai. bhed, bakri, gae. bail, bhais machli itne bade paimane par khae jate hai lekin aaj tak unki tadad kam nahi hui hai, kio ki allah ne use khane ke lie hi banaya hai. or sher cheeta or doosre jangli janwar jise allah ne khane se mana kia hai dekhie unke shikar se wo vilupti ke kagar per hai. per in kue ke medako ko kaun samjhae. pata nahi kab ye universal soch paida karenge or chizo ko vaisgwik nazrie se dekhenge. phir is par adharit doosre udyao dhandho se logo ko mil rahe rojgar ka bhi sawal hai???????????????

abhishek1502 ने कहा…

आप से तो यही उम्मीद थी . अगर हम पर कीचड़ उछालने से इस्लाम का कलंक मिट जाता है तो खूब उछालिये पर मेरा प्रश्न आप की क्रूरता को बतात ही रहेगा . कुतर्क में तो आप ने महारत हासिल की है वैसे भी आप के यह ऐसे ही लोग आलिम और पहुचे हुए घोषित है
आप का ज्ञान आप के मुर्खाना प्रश्न से ही झलक गया .
शरीर के निर्जीव होने के साथ ही जीवित कोशिकाए भी नष्ट हो जाती है फिर उन को सड़ाने गलाने वाले जीवाणु उत्पन्न हो तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते है जो नष्ट न होने पर महामारी का रूप भी ले सकते है .
क्या खटमल और मच्छर को मारना अपराध है ??????
जमाल जी ऐसे मुर्खाना प्रश्न कर अपनी और अपने समर्थको की पोल मत खोलिए

vedika ने कहा…

वह मासूम साहब आप ने खुद ही तय क्र लिया की खुदा को क्या पसंद है ?
उसको दुसरो जीवो का मांस खाना पसंद है ????????

आप लोग सही कह रहे है मुस्लिम भी बहुत बढ गए है
आप तो सर्वहारी है फिर इंसान के मांस से क्या एतराज

जमाल तू तो इश्वर का हवाला देता है मुझे
अभी तक मांसाहार कैसे गलत है अभी तक समझ में नही आया

vedika ने कहा…

idesri waise kis had tak tu inke sath hai

vedika ने कहा…

अनवर के ब्लॉग पर भी कुछ कॉपी पेस्ट कर दिया कर
वह तो कुछ कठमुल्ले ही जाते जो कॉपी पेस्ट करते है
७-८तुम भी कर दिया करो ताकि २० तक कमेन्ट हो ही जाये

वरना जमाल खुद ही ques-ans करता रहता है

अहतशाम "अकेला" ने कहा…

भाई वह क्या खूब लिखते हो
बड़ा सुन्दर लिखते हो
लेखक ने बड़े ही सजीव ढंग से अपने ज्ञान को शब्दों कि माला में पिरोया है
इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जो गलत या निंदनीय हो
फिर भी कुछ लोग फूलों में सिर्फ कांटे ही ढूँढ़ते हैं
और रही बात जीव हत्या कि तो----
भगवान् राम चन्द्र जी जब हिरन का शिकार करते हैं तो जीव हत्या नहीं होती
भगवान् के बाप दशरथ श्रवण कुमार कि हत्या कर देता है वो भी गलत नहीं है
बस गलत है तो मुसलमानों के द्वारा किया हुआ हर कार्य

Anonymous ने कहा…

BHAGWAN RAM NE JO SHIKAR KIYA KYA USKO KHAYA BHI THA

अहतशाम "अकेला" ने कहा…

तुम लोगो को जलन खाने से है या हत्या से पहले तो ये फैसला कर लो
शिकार करके खाया नहीं इसलिए ये सही है
अपनी पत्नी (सीता) के कहने पर मासूम जानवर को जान लेना ये कोनसा धर्म है
तुम्हारे तो भगवान् ही मासूमो कि जान लेते हैं हम तो आम इन्सान हैं
तुम लोग शराब पीते हो नशा करते हो गुंडागर्दी करते हो और कहते हो हमारे तो भगवान् (शिव) भी नशा करते थे तो हम क्यूँ ना करें

Tausif Hindustani ने कहा…

तथ्यात्मक एवं सार्थक पोस्ट
सर्वोपरी सभी वस्तु मनुष्य के लिए है ,
एवं इस जग के पालनहार का आदेश सर्वोपरी है बिना किसी तर्क वितर्क के , सृष्टि के पालनहार के आदेश की अवहेलना सब से बड़ा पाप है
अब हमें ये विचार करना है की हम इस जग के पालनहार , सर्वशक्तिमान के इच्छानुसार जीवन व्यतीत करते है या अपनी इच्छानुसार
dabirnews.blogspot.com
ajabgazab.blogspot.com

सलीम ख़ान ने कहा…

@ahtsham jee hamen aise shabdo se parhez karna chahiye jo dushmane ISLAm istemal karte hai aur waqaee ghalat bhi hai...

अहतशाम "अकेला" ने कहा…

सलीम भाई ये में भी मानता हूँ और जनता भी हूँ लेकिन
मेरी किरिया नहीं प्रतिकिर्या थी
इन्हें ईट का जवाब पत्थर से देना चाहिए
लातों के भूत बातों से नहीं मानते

सलीम ख़ान ने कहा…

sahi kaha aapne ahtisham bhai !

abhishek1502 ने कहा…

अगर हम पर कीचड़ उछालने से इस्लाम का कलंक मिट जाता है तो खूब उछालिये पर मेरा प्रश्न आप की क्रूरता को बतात ही रहेगा
मैंने पोस्ट पर ही कमेन्ट किया है . अगर मेरी बात का जवाब नही है तो उसे सोचो इधर उधर की बात मत करो अगर मैंने मोहम्मद का चरित्र बताना सुरु किया न जवाब देते नही बनेगा .
मैं सिर्फ मुद्दे की बात पर ही रहना चाहता हू . है कोई मुस्लिम विद्वान् जो हलाल को मानवीय सिद्ध कर सके?????
क्या तुम्हारा अल्लाह जानवरों को तड़प तड़प कर मरता देख कर खुश होता है ?????
ये कार्य तो शैतान का है तो क्या अल्लाह शैतान है और उस को मानने वाले भी उस के ही जैसे है ????????
अर्थात इबलिस सच्चा था और दूसरे फरिश्तो की तरह डरपोक नही था इसी लिए वो आज तक है और अकेला ही काफी है बुरईयो के लिए
बुरे तो सच्चे को बुरा ही कहेंगे सो अल्लाह का हुक्म न मानने वाले को शैतान घोषित कर दिया .

Tausif Hindustani ने कहा…

अभिषेक ढक्कन , कितनी बार कह चूका हूँ अपने अकाल का ढक्कन खोलो फिर मुंह खोलो , आमा यार कुछ समझ में आया की नाही
और हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बारे तुम जैसे ढक्कन क्या बता पाएंगे जाओ बेटा पहले किसी पुस्तकालय में रात दिन एक करके पुस्तक पढो फिर शायद कुछ ज्ञान प्राप्त हो,
http://en.wikipedia.org/wiki/The_100
ये पढ़ लेना कुछ तो दिमागी वहम कम होगा
The 100 A RANKING OF THE MOST INFLUENTIAL PERSONS IN HISTORY
(BY. MICHAEL H. HART)पुस्तक किसी मुसलमान ने नहीं लिखी है फिर भी हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को प्रथम स्थान दिया है
उनके जैसा अज़ीम अल्लाह का बंदा न कोई पैदा हुआ है न पैदा होगा

एस.एम.मासूम ने कहा…

कुछ बेनामी सवालात आये हैं, और मैं किसी बेनामी का जवाब नहीं दिया करता. इंसान और जानवर का फर्क हे जब इन्सान ना समझ सका तो धर्म को क्या समझेगा. लगता ऐसा है की मसला जीव हत्या का नहीं बल्कि इस निश्चय का है की इस्लाम का जो भी तरीका है , उस पे एतराज़ करना है बस. यही फितरत इंसान की उसको बेईमान बनाती है और यही लोग नफरत की सौदागरी करते हैं.
बात को समझो तो यह लेख़ एक बेहतरीन लेख़ है. और ना समझो तो इसका कोई इलाज नहीं..

Third Eye ने कहा…

jo manse khate hai khate rahe.un ko ham rok nahi sakte.unki padaisi hi esi hai.unka dharm hi esa hai . ham kya kar sakte hai?manse khane wale janwer ke samne ham bhala roti rakhenga to kya wah khayega

arpit ने कहा…

bhai mein sirf ye puchna chahta hu ki jisse ham dhote hain usse khate kyu nahi. bas yahi wajah hai kuch cheejo ke sath rahna padta hai lekin muh nahi lagaya jata. jeev hatya tab tak sahi nahi hai jab tak wo hamare astitva ke liye khatra na ho ya jab tak hamara uske bina kaam na chale.
kam se kam mein to apne pet ko kabristan nahi banana chahta.

Jitu pandey ने कहा…

kaun se khuda ko pasand karte ho because कुरआन कहता है ,एक नहीं दो खुदा हैं "इलाहुना व् इलाहुकुम " यानी मेरा खुदा और तुम्हारा खुदा
saleem you know गर्भाधान
की परंपरा अल्लाह के नबी लूत से शुरू हुई .लूत ने अपनी दौनों लड़कियों का
गर्भाधान किया था.बाद में उसी गर्भाधान से यहूदिओं और मुसलमानों की नस्लें
पैदा हुयीं .तौरेत -उत्पत्ति -१९:३२ से ३६ ..

भरत चौधरी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Bipin ने कहा…

Yaar, tu eek dimagi kira hai. pehelay eek acchey se manochikitsak ko dikha.
Tumney mansahari ki baat kehi hai auur bataya hai ki har ek jivdhari manushya k upbhog k ley paida kiya gaya hai--------- Tab to Bhag be bechara keha sakata hai ki manushya sirf meray khana k ley pada kiya gaya hai.
Auur raha saval Islam k Mhanta ki---- Jo dharm mahan hota hai usey yu tumhari taraha tark/kutark ya ghoshna nahi karni parti.
Try to come out from the arguments & narrow assumption regarding religion & set the similarities and evidence concerned to the religion.Though all religious seems to be different from outer aspects but their fundamental principles remain same.

Arun ने कहा…

सलीम जी, मैंने आपके ब्लौग पढ़े। काबा के शिवलिंग के बारे में आपने लिखा है कि यह पृथ्वी का केन्द्र विन्दु था। काबा इस्लाम पूर्व का प्राचीन स्थान है तथा इसको काव्य (शुक्राचार्य) के स्थान के रूप में कहा गया है। यहीं असुर राजा बलि ने यज्ञ किया था। उनकी राजधानी मिस्र या लिबिया में थी। यह देव क्षेत्र की सीमा में था, अतः वामन के अनुरोध पर राजा बलि ने उसे इन्द्र को वापस कर दिया था। उस समय भी यह प्रसिद्ध स्थान था, अतः बलि ने यहां यज्ञ किया। शुक्राचार्य को उशना भी कहा जाता था। वे वरुण के वंशज थे, जो अरब की ताज जाति के थे (यादसां-पतिः, अप् पतिः-ये वरुण के नाम हैं)। उनका समुद्र पर प्रभुत्व होने से सम्द्र को ओशन (ocean) कहा जाता है। इनका शिव पूजा या इस्लाम से कोई विरोध नहीं है-एक ही चीज को अलग अलग शब्दों में कहा जाता है। समुद्र के अधिपति के रूप में यह नकशे का केन्द्र स्थान हो सकता है। कई मूल शब्द अरबी तथा संस्कृत में एक जैसे हैं-जिनको तवाफ़ुके लिसानैन कहा गया है (मुस्तफ़ा खां मद्दाह का उर्दू-हिन्दी कोष)। नक्षत्र देखकर ही मानचित्र (माप = ) बनता है, अतः इसे नकशा कहा जाता है। प्राचीन विश्व में दो प्रकार के ४-४ केन्द्र थे जो एक दूसरे से ९०-९० अंश पूर्व-पश्चिम दिशा में दूर थे। आदम (स्वायम्भुव मनु, २९०१२ ईसा पूर्व) के समय ये थे-इन्द्र की अमरावती, ९० अंश पश्चिम यम की संयमनी (यमन की राजधानी सना), १८० अंश पश्चिम सोम की विभावरी, तथा ९० अंश पूर्व वरुण (यह समुद्री क्षेत्र होने के कारण वरुण है) की सुखा नगरी थी। बाद के वैवस्वत मनु (१३९०२ ईसा पूर्व) में लंका (उज्जैन की देशान्तर रेखा पर विषुवत् रेखा पर) केन्द्र स्थान था, ९० अंश पश्चिम रोमक-पत्तन (मोरक्को का पश्चिमी भाग, हरकुलस के स्तम्भ), १८० अंश पश्चिम या पूर्व सिद्धपुर (मेक्सिको में, ब्रह्मा द्वारा यहां पूर्व की सीमा के लिये द्वार = पिरामिड बनाया गया था-रामायण, किष्किन्धा काण्ड ४०/५४, ६४), तथा ९० अंश पूर्व यम-कोटि-पत्तन (न्यूजीलैण्ड का दक्षिण पश्चिमी तट) था। काबा लंका (उज्जैन) तथा रोमक पत्तन का मध्य स्थान हो सकता है। क्या आपके पास कोई अन्य उल्लेख भी है-यह बहुत उपयोगी होगा।
मैंने बकरीद, बिस्मिल्ला की व्याख्या लिखी है। यह सही है कि मनुस्मृति आदि में मांसाहार वर्जित नहीं है, चरक-संहिता में ३ अध्याय केवल मांस के गुणों के बारे में हैं। पर उसे तामसिक कहा गया है जो साधक के लिये उचित नहीं है। कुरआन तथा बाइबिल में स्पष्ट रूप से कई स्थानों पर मांसाहार वर्जित है। स्पष्ट रूप से बकरीद का अर्थ न तो बकरे की पूजा है, न उसका मांस खाना है। संस्कृत में भी अज का अर्थ बकरा तथा भगवान दोनों होता है। इस अर्थ में मैंने इनकी वैदिक व्याख्या की है। यह आप मेरे वेब-साइट www.scribd.com/Arunupadhyay पर देख सकते हैं-अरुण कुमार उपाध्याय, , (M) 09437034172

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