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| सुरेश चिपलूनकर |
सुरेश भाई ! आपका पूरा लेख पढ़ा ! और पढ़ कर अच्छा लगा. आप एक अच्छे लेखक और ब्लॉगर हैं. इसे मैं जानता भी हूँ और मानता भी हूँ क्यूँ कि आप लेखन सिर्फ अपनी चाटुकारिता के लिए नहीं बल्कि मक़सद के लिए लिखते हैं, यह एक अच्छी बात है.
लेख के अंतिम तीन पैराग्राफ में आप गच्चा खा गए. जब आपने राष्ट्रवाद की बात कि इसलिए... मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बुनियाद सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ़ रहना ही है. उधर पाकिस्तान में भी आप ही कि तरह के कट्टरपंथी और इधर आप जैसे कट्टरपंथी लोग इस भावना में जी रहे हैं और इसके आगे बढ़ने की सोच ही नहीं रहे हैं. पाकिस्तान के खिलाफ़ मैच जीतने पर जितनी ख़ुशी आप ज़ाहिर करते हैं, अन्य देशों से जीतने पर क्यूँ नहीं करते, उस वक़्त आपका राष्ट्रवाद कहाँ चला जाता है? तार्किक रूप से बात करें तो इस तरह क्या इंग्लैंड हमारा दुश्मन नहीं हो सकता? उसने तो हमारे देश को सैकणों साल ग़ुलाम रखा????????????????????
अगर ऐसा ही है तो भैया वाक़ई आपका राष्ट्रवाद पेशाब की झाग की तरह है, जैसा की यह वाक्य आपने अपने ही ब्लॉग पर इस्तेमाल किया !!!!!!!!!!
आगे एक सॉलिड सवाल जिसका जवाब आपने पिछले डेढ़ साल से आज तक नहीं दिया, आज भी आप देंगे उम्मीद कम ही है !?

