कहते हैं कि दिल हमेशा सही होता है और आपको किसी भी बात पर या सोच पर अपनी राय सही और सकारात्मक दिशा में ही देता है. अगर आप कोई भी कार्य करने जा रहे हैं जो ग़लत है तो दिल आपको आगाह कर देता है कि यह कार्य सही नहीं है. ख़ुद पर आज़मा कर देखिये कि क्या यह सही राय नहीं देता !? अगर आप शराब पीते हैं तो भले ही आप शराब पी कर खुश होते हों मगर पीने के चन्द क्षणों पहले ही आपका दिल आपको आगाह कर देता है कि शराब पीना ग़लत बात है और आपको नुक्सान ही पहुंचाएगी लेकिन आप तुरन्त दिल की बात को नज़र अन्दाज़ करने के लिए कहता है और आप शराब को पीने लगते हैं. इसी तरह के तमाम वो काम जो कि ग़लत हैं को करने से पहले दिल फ़ौरन मना कर देता है.
लेकिन सवाल है कि दिल के लाख मना करने के बावजूद इंसान ऐसा क्यूँ करता है? कभी सोचा है आपने !? चलिए मैं बताता हूँ... ! उसकी एक वजह है जिस इन्सान के दिल और दिमाग़ में कोई कालापन नहीं होता है वह अपने दिल या दिमाग़ दोनों की संतुष्टि के बाद कोई भी ऐसा कार्य नहीं करता है और सही और सकारात्मक रास्ते को अख्तियार कर लेता है वहीँ जिन इन्सान के दिलों में कालापन भरा होता है उसका दिल भी सही काम करने के लिए आगाह नहीं करता बल्कि ग़लत कार्य करने के लिए उकसाता है. यही वजह है कि इन्सान तमाम ऐसे ग़लत कार्य करता ही चला जाता है और उसमें सुधार की गुन्जाईश ख़त्म हो जाती है. वह इन्सान तभी सुधरता है जब उसके ग़लत कार्य का घड़ा भर जाता है अथवा उसको उनके कृत्य की भरपूर सज़ा मिल जाती है. कुछ लोग तो उसके बाद भी अपना उक्त प्रकार का कृत्य जारी रखते हैं और ज़िन्दगी भर अँधेरे में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं क्यूंकि उनको उन अंधेरों में ही मज़ा आता है.
कुरआन में लिखा है - "वे बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं और वे अब लौटने के नहीं.- सुरह अल-बकरा, अध्याय-2, श्लोक-18


2 पाठकों ने अपने विचार व्यक्त किये:
दिल को अरबी में क़ल्ब कहते हैं और क़ल्ब का हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है पलटते फिरना.
कहा गया है-
दिल तो है दिल दिल का एतबार क्या कीजे..
हंसी के फव्वारे
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