डूबते हुए सूरज ने कहा- 'मेरे बाद इस संसार में मार्ग कौन दिखलायेगा? कोई है जो अंधेरों से लड़ने का साहस रखता हो?' और फिर एक टिमटिमाता हुआ दीया आगे बढ़ कर बोला -- 'मैं सीमा भर कोशिश करूँगा!' - सलीम खान, लखनऊ/पीलीभीत, उत्तर प्रदेश Email: swachchhsandesh@gmail.com

यह रोज़ा क्या है?

Written By सलीम ख़ान on मंगलवार, 2 अगस्त 2011 | Tuesday, August 02, 2011

इस्लाम में दूसरी अनिवार्य चीज़ रोज़ा है। जिस पाठ को नमाज़ प्रतिदिन पाँच बार याद दिलाती है उसे रोज़ा वर्ष में एक बार पूरे महीने तक हर समय याद दिलाता रहता है।‘रमज़ान’ (अरबी का नवाँ महीना) आया और सुबह से लेकर शाम तक आपका खाना-पीना बन्द हुआ। सहरी (अरुणोदय से पूर्व की बेला जिसमें कुछ खा-पी लिया जाता है ताकि दिन में रोज़ा रखने में असाधारण कष्ट न हो।) के समय आप खा-पी रहे थे, अचानक अज़ान हुई और आपने तुरन्त हाथ रोक लिया। अब कैसा ही रुचिकर भोजन आगे आए, कैसी ही भूख-प्यास हो, कितनी ही इच्छा हो, आप शाम तक कुछ नहीं खाते। यही नहीं कि लोगों के सामने नहीं खाते, नहीं, एकांत में भी नहीं जहाँ कोई देखने वाला नहीं होता, एक बूंद पानी पीना या एक दाना निगल जाना भी आपके लिए असंभव होता चाहे कोई व्यक्ति भी देखने वाला न हो। फिर ये सारी रुकावट एक समय तक ही रहती है। इधर दिन डूबा और आप ‘इफ़्तार’ (कुछ खा-पीकर रोज़ा खोलने) की ओर लपके। अब रात भर बेख़ौफ़ होकर आप जब और जो चीज़ चाहते हैं खाते हैं। विचार कीजिए, यह क्या चीज़ है? इसकी तह में ईश्वर का भय है, उसके सर्वविद्यमान और सर्वज्ञाता होने का विश्वास है, आख़िरत के जीवन और ईश्वर की अदालत पर ‘ईमान’ है, क़ुरआन और रसूल (पैग़म्बर) का पूर्ण आज्ञापालन है, कर्तव्य का ज़बर्दस्त एहसास है, धैर्य और संकटों के मुक़ाबले का अभ्यास है, ईश्वर की प्रसन्नता के मुक़ाबले में मन की इच्छाओं को रोकने और दबाने की शक्ति है। प्रत्येक वर्ष ‘रमज़ान’ का मास आता है ताकि पूरे ही तीस दिन तक ये रोज़े आपको प्रशिक्षित करें और आप में ये समस्त गुण उत्पन्न करें ताकि आप पूरे और पक्के मुसलमान बनें, और ये गुण आपको उस ‘इबादत’ के क़ाबिल बनाएँ, जो एक मुसलमान को अपने जीवन में हर समय करनी चाहिए।
फिर देखिए, अल्लाह ने समस्त मुसलमानों के लिए रोज़ा एक ही विशेष महीने में अनिवार्य किया है ताकि सब मिलकर रोज़ा रखें, अलग-अलग न रखें। इसके बेशुमार दूसरे लाभ भी हैं। सारी इस्लामी आबादी में पूरा एक माह पवित्रता का मास होता है, सारे वातावरण पर ईमान, ईश-भय और आदेशों का पालन और नैतिक पवित्रता और आचरण-सौन्दर्य छा जाता है। इस वातावरण  में बुराइयाँ दब जाती हैं और नेकियाँ उभरती हैं। अच्छे लोग नेक कामों में एक-दूसरे की सहायता करते हैं। बुरे लोग बुरे काम करते हुए शर्माते हैं। धनवान लोगों में ग़रीबों की सहायता की भावना जागृत होती है। ईश्वर के मार्ग में माल ख़र्च किया जाता है। सारे मुसलमान एक हालत में होते हैं। और एक हालत में होना उनमें यह एहसास पैदा करता है कि हम सब एक जमाअत (समुदाय) हैं। रोज़ा उनमें बंधुत्व, सहानुभूति और पारस्परिक एकता उत्पन्न करने का एक कारगर उपाय है।

ये सब हमारे ही फ़ायदे हैं। हमें भूखा रखने में ईश्वर का कोई लाभ नहीं। उसने हमारी भलाई के लिए रमज़ान के रोज़े हमारे लिए अनिवार्य किए हैं। बिना किसी उचित कारण के जो लोग रोज़े नहीं रखते वे अपने ऊपर स्वयं ज़ुल्म करते हैं और सबसे अधिक शर्मनाक नीति उनकी है जो रमज़ान में खुल्लम-खुल्ला खाते-पीते हैं, वे मानो इस बात की घोषणा करते हैं कि हम मुसलमानों के समुदाय से नहीं हैं। हमको इस्लाम के आदेशों की कोई परवाह नहीं है और हम ऐसे स्वच्छन्द हैं कि जिसको ईश्वर मानते हैं उसके आज्ञापालन से खुल्लम-खुल्ला मुँह मोड़ जाते हैं। बताओ जिन लोगों के लिए अपने समुदाय से अलग होना एक आसान बात हो, जिनको अपने सृष्टिकर्ता से बग़ावत करते हुए तनिक भी शर्म न आए और जो अपने धर्म के सबसे बड़े पेशवा के नियत किए हुए क़ानून को खुल्लम-खुल्ला तोड़ दें, उनसे कोई व्यक्ति किस प्रतिज्ञा-पूर्ति, किस सदाचार और विश्वसनीयता, किस कर्तव्यपरायणता और क़ानून के पालन की आशा कर सकता है।

1 पाठकों ने अपने विचार व्यक्त किये:

राहुल पंडित ने कहा…

तुम राम कहो या रहीम कहो,मतलब उसका अल्लाह से है
तुम धर्म कहो या दीं कहो,मनसा तो उसकी चाह से है

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